सितम्बर 26, 2022 2:45 अपराह्न

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1998 का फुटबॉल विश्वकप: धुंधली यादें और आगामी महासमर का आगाज

मुझे आज भी याद है, उन दिनों 1998 का फुटबॉल विश्व-कप चल रहा था। टीवी पर मैच का लाइव प्रसारण, कभी नहीं देखा था। यह एक बेहद रोमांचक अनुभव था।

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1998 के विश्व-कप की धुंधली यादें और फुटबॉल के आगामी महासमर का आगाज

मुझे आज भी याद है, उन दिनों 1998 का फुटबॉल विश्व-कप चल रहा था। भारत-पाकिस्तान के मध्य उन दिनों तनाव बढ़ता ही जा रहा था। भारत जैसे देश में भी, जिसका फुटबॉल से कोई नाता तक नहीं था, बाकी सब कुछ थम सा गया था।

टीवी-अखबारों से लेकर स्कूल-चौराहों तक चारों तरफ बस फुटबॉल की ही बातें हो रही थी। मैं तब सिर्फ छः-सात साल का था। टीवी पर इससे पहले मैंने कभी कोई फुटबॉल मैच, वो भी मैच का लाइव प्रसारण, कभी नहीं देखा था। यह एक बेहद रोमांचक अनुभव था।

सबकी चहेती टीम थी ब्राजील

अखबारों में लगभग 5-6 माह पहले से ही विश्व-कप को लेकर माहौल बनाया जा रहा था। सभी अखबारों ने एक स्वर में पिछले विश्व-कप की विजेता ब्राज़ील को ही इस बार भी फाइनल जीतने के लिए पंसदीदा माना था। इसके पीछे ठोस वजह थी दीदा, काफू और रोबर्तो कार्लोस से लैस ब्राज़ीली डिफेंसिव लाइन; रिवाल्डो, कप्तान डूंगा, डेनिल्सन आदि से सुसज्जित मिडफील्ड और फारवर्ड लाइन में मौजूद रोनाल्डो। रियो दी जनेरियो की मलीन बस्तियों से निकल कर आए रोनाल्डो उस दौर में ऐसे खिलाड़ी हुआ करते थे जिनका नाम ही विपक्षी खेमे में खौफ पैदा कर देता था।

‘ऑरेंज’ ने जीता सबका दिल

जैसे ही विश्व-कप शुरू हुआ संपूर्ण विश्व की नजरें बस फ्रांस में चल रहे फुटबॉल मैचों पर ही बनी रहतीं। ब्राज़ील, अर्जेंटीना, इटली, जर्मनी आदि बड़ी टीमों के मध्य एक टीम थी जो धूम मचा रही थी। वह टीम थी अपनी पारंपरिक ऑरेंज जर्सी पहने संपूर्ण विश्व को अपने जादुई खेल से सम्मोहित कर लेने वाली सीडौर्फ, वान डर सार, जाप स्टैम, बर्जकैंप, बोअर ब्रदर्स और एडगर डेविड्स की नीदरलैंड्स।

कितना आसान था विश्व विजेता टीम बनाना

फ्रांस की टीम, जिसमें एक से बढ़कर एक सूरमा थे, लगातार विपक्षियों पर कहर बरपा रही थी। वे ग्रुप-स्टेज के तीन मुकाबलों में 9 गोल स्कोर कर चुके थे। थिएरी हेनरी व डेविड ट्रैजैगुए जैसे उदीयमान खिलाड़ी भी वैश्विक स्तर पर फुटबॉल के सबसे बडे़ मंच पर बैखौफ होकर खेल रहे थे।

ध्यान देने वाली बात है कि, 4 वर्ष पूर्व, फ्रांस की टीम इज़राइल और बुल्गारिया के खिलाफ हुए विश्व-कप के क्वालीफायर मुकाबलों में घर में खेलते हुए भी अप्रत्याशित तरीके से हारकर सन् 1994 के विश्व-कप में जगह नहीं बना सकी थी। क्या आज आप सोच भी सकते हैं की फ्रांस जैसी मजबूत टीम 1994 के विश्व-कप के लिए क्वालीफाई भी नहीं कर सकी थी।

पूरे देश में इसको लेकर रोष व्याप्त था, लोग गुस्से में थे। फ्रेंच मीडिया ने कोच से लेकर अंतिम खिलाड़ी तक सबको ही गुनहगार साबित कर दिया था। ऐसे में जब एक नई टीम खड़ी करने के लिए ‘एमे जेके’ को फ्रेंच टीम का नया कोच नियुक्त किया गया तो मीडिया ने उन्हें भी नहीं बख्शा। लगातार उन पर व उनकी फ्रेंच टीम को लेकर जहर उगला जाता रहा।

संपूर्ण देश में ऐसा कोई भी नहीं था जिसको उनपर यकीन हो। खेल से जुड़े लोग भी आखिर इंसान ही होते हैं। इन सब बातों का उनपर भी असर पड़ता ही है। एमे जेके के पास एक प्लान था। वो इन छींटाकशी को अपनी टीम को एक करने के लिए इस्तेमाल करना चाहते थे।

वो खिलाड़ी और उनके परिवारों के लिए अक्सर भोज का आयोजन करते और एक एक खिलाड़ी से उस लम्हें से लेकर विश्व-कप के आगाज तक क्या क्या किया जाना है इसपर घंटों बातें करते। एमे टीम के हर खिलाड़ी को पहले तो खुद पर और फिर टीम पर भरोसा करना सिखा रहे थे। इसके असर दिखने भी लगे थे। 1996 के यूरो कप में फ्रांस ने सेमी-फाइनल तक का सफर तय किया। एमे जेके की फ्रांस अब हर परिस्तिथियों से लड़ने में सक्षम होती जा रही थी।

विश्व-कप में फ्रांस की धमाकेदार शुरुआत

विश्व-कप से कुछ माह पूर्व कोच एमे ने संपूर्ण टीम को क्लैयरफोंटेन में एक बबल में रख मीडिया और हर ओर से आने वाली तमाम तरह की नकारात्मकता से दूर किया। टीम नहीं जानती थी अखबारों में क्या छप रहा है। टीम तो एकजुट होकर अपनी तैयारियों को अंजाम दे रही थी।

विश्व-कप की शुरुआत भी फ्रांस ने काफी आक्रामक अंदाज में की थी। ग्रुप स्टेज के तीन मैचों में नौ गोल दागकर वो विरोधियों को अपने आगमन का संदेश दे चुके थे। बार्थेज़, ब्लांक, जिदान, विएरा, लिज़ाराज़ू, डेस्चैंप्स, पेतीत, ट्रैजैगुए, हेनरी, पाइरेस और थुर्रम जैसे सितारों से सजी ‘लेस़ ब्ल्यूज़’ एक टीम के तौर पर मैदान में उतरती थी। यह टीम ‘ वन फॉर ऑल, ऑल फॉर वन’ के सिद्धांत के साथ बेखौफ होकर खेल रही थी।

ब्राज़ील बनाम फ्रांस

जहाँ एक तरफ ब्राज़ील नीदरलैंड्स को पेनाल्टी शूटआउट में 4-2 से हराकर फाइनल में जगह बना चुकी थी वहीं फ्रांस ने ‘लिलीयन थुर्रम’ के दो गोलों की बदौलत 2-1 के स्कोर के साथ सेमीफाइनल में क्रोएशिया को मात देकर फाइनल का टिकट बुक करवा लिया था। फुटबॉल विश्व-कप के इतिहास में यह क्रोएशिया जैसे छोटे से देश का अबतक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन था

अब सभी को इंतजार था तो बस 12 जुलाई 1998, इस तारीख का। दुनिया दो धड़ों में बंट चुकी थी। विश्व-कप की चमचमाती ट्रॉफी रोनाल्डो की ब्राज़ील उठाएगी या जिदान फ्रांस को घर में विजेता बनाएंगे कोई नहीं जानता था। खैर, यह दिन भी आया। कुछ ही घंटों में टूर्नामेंट का फाइनल मुकाबला खेला जाना था।

फ्रांस के लिए एक बुरी खबर यह थी की उनके अनुभवी डिफेंडर लॉरेंट ब्लांक फाइनल मैच के लिए उपलब्ध नहीं थे। उस रोज इस मैच को देखने के लिए विश्वभर से दो बिलियन लोग अपनी टीवी-स्क्रीन पर चिपके हुए थे। लेकिन फिर मैच से कुछ ही घंटों पहले कुछ बेहद अटपटी सी घटना हुई।

फाइनल मैच से चंद घंटे पहले रोनाल्डो गंभीर रूप से बीमार हो गए थे। वह बुरी तरह से कांप रहे थे और सांस तक नहीं ले पा रहे थे। यह शायद पैनिक अटैक था। ब्राज़ील की टीम रोनाल्डो को केन्द्र में रखकर ही अपना जाल बुनती थी। सभी खिलाड़ी यह देखकर एक गहरे सदमे में चले गए थे। सभी खिलाड़ी खामोश थे।

खैर, कुछ ही घंटों में खबर आई की इंटर-मिलान के स्टार खिलाड़ी मैच में ब्राज़ील के लिए खेलने के लिए फिट हैं। उन्होंने ड्रैसिंग-रूम में पहुँच कर ऐलान कर दिया था की शायद यह उनका अंतिम विश्व-कप हो सकता है और वो इसको हर हाल में जीत कर रहेंगे।

जिदान की कायल हुई दुनिया

मुख्य रेफरी ‘सैड बेल्कोला’ ने व्हिसल बजाई। सन् 1998 के विश्व-कप का बहुप्रतीक्षित फाइनल मुकाबला शुरू हो चुका था। टूर्नामेंट की डिफेंडिंग चैंपियन ब्राज़ील की अद्भुत टीम फ्रांस के आगे शुरू से ही 19 साबित हो रही थी। फ्रेंच मिडफील्डर जिदान मनमाने तरीके से अपने विपक्षियों को अपनी धुनों पर नचा रहे थे। यह शायद ‘जीज़ू’ का ही दिन था। वो आपको मैदान में हर जगह दिखते। ब्राज़ील के पास उस दिन उनका कोई जवाब नहीं था।

मैच के 27वें मिनट में फ्रांस को कॉर्नर-किक मिली। फ्रेंच कोच एमे जेके, आज से चंद माह पूर्व तक जिनसे उनका स्वयं का देश भी नफरत करता था, कॉर्नर-किक्स पर ब्राज़ील की खराब डिफेंस के बारे में बखूबी से जानते थे। उन्होंने जिदान को नियर-पोस्ट पर खड़े रहने को कहा।

कॉर्नर-किक ली गई, जिदान ने खूबसूरत हेडर लगाकर गोल स्कोर किया और ब्राज़ील ने कमजोर डिफेंडिंग का खामियाजा भुगता। एक और बार मैच के 45वें मिनट में जिदान ने विपक्षी गोलपोस्ट की ओर दौड़ लगाकर इतना जोरदार हेडर लिया जिसका ब्राज़ीली गोलकीपर दीदा के पास कोई जवाब न था। और इसके साथ ही पहले हाफ की समाप्ति पर मैच का स्कोर 2-0 हो गया था।

फाइनल व्हिसल बजने पर स्कोर 3-0 था। फ्रांस न सिर्फ ‘सेंट-डेनिस’ में खेले जा रहे विश्व कप के फाइनल मुकाबले को जीत चुका था बल्कि पहली दफा फुटबॉल का विश्व कप भी जीत चुका था। सारा फ्रांस उस रोज सड़कों पर उतर आया था। चारों ओर जश्न ही जश्न था। हर कोई झूम रहा था। हर कोई मुस्कुरा रहा था।

उस रात जब टीवी पर मैंने फ्रांस की विश्व विजेता टीम की विक्ट्री-परेड देखी और देखा सड़क के दोनों ओर लाखों की संख्या में उमड़े दर्शकों के हुजूम को, तब मैंने जाना आखिर क्या मायने हैं इस खेल के। और सच कहूं तो तब से उतनी ही रोचकता से मैं फुटबॉल का हर एक मैच देखता हूं।

यूरो-2020 और कोपा अमेरिका-2021 को लेकर उत्सुकता

मैं खुद को खुशनसीब ही मानता हूँ जो इस खेल के कई बड़े खिलाड़ियों को खेलता देख सका। मैंने रोनाल्डो, जिदान को भिड़ते देखा तो कैनेवारो व पिर्लो की इटली और कैसियास व इनिएस्ता की स्पेन को सारा विश्व फतह करते देखा। मैं अपने जीवनकाल में खेल जगत के सबसे दुखदायी क्षणों में से एक का भी साक्षी रहा।

जब मैंने सन् 2014 में जर्मनी के हाथों विश्व कप के फाइनल मैच में ‘माराकाना स्टेडियम’ में अर्जेंटीना की हार के पश्चात लियोनेल मैसी को नम आँखों से विश्व कप की ट्राफी को निहारते देखा था। उस वक्त शायद संपूर्ण विश्व उनके दुख में शरीक़ होकर एकसाथ रोया था।

खैर, इस साल जून माह में यूरो कप-2020 और कोपा अमेरिका-2021 खेले गए। और क्या कमाल के मैच हम सभी खेल प्रेमियों को देखने को मिले. जहाँ इटली ने यूरो कप जीता तो वहीं मैसी की अर्जेंटीना ने कोपा अमेरिका का खिताब जीत सारी दुनिया की आंखों में पानी भर दिया था.

इन दो टूर्नामेंट्स के साथ ही इस वर्ष कतर में होने जा रहे विश्व-कप को लेकर भी चर्चाएं शुरू हो गई हैं। चारों ओर अब बस फुटबॉल की ही बातें होंगी। रोमांच अपने चरम पर होगा। यह तीनों टूर्नामेंट्स इसलिए भी खास हैं क्योंकि शायद यह अंतिम मौका है जब हम इस सदी और इतिहास के दो सर्वकालिक महान फुटबॉलरों क्रिस्टियानो रोनाल्डो और लियोनेल आंद्रेस मैसी को अंतिम बार अपनी राष्ट्रीय-टीमों के लिए खेलते हुए देखेंगे।

क्रिस्टियानो रोनाल्डो पुर्तगाल के संग पिछला यूरो कप जीत चुके हैं तो वहीं लियोनेल मैसी कोपा अमेरिका-2021 जीतकर सीनियर लेवल पर अर्जेंटीनी टीम के संग पहला खिताब जीत गए। विश्व कप की चमचमाती ट्राफी को अपने हाथों में लेकर झूमने से हालाँकि, अभी भी यह दोनों खिलाड़ी मायूस ही रहे हैं. इस बार यह खिताब जीत उनकी ओर से यह खेल को एक अंतिम अलविदा हो सकता है।

फुटबॉल के आगामी महासमर का आगाज होने को है। कई रोमांचक मुकाबले हमारी प्रतिक्षा कर रहे हैं। अपनी अपनी सीटबेल्ट बांध लीजिए क्योंकि, खुशियों का कोई ठिकाना न होगा और न होंगी उत्तेजना की कोई सीमाएं।

गौरव शर्मा
गौरव शर्मा
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