फ़रवरी 4, 2023 3:12 अपराह्न

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अच्छा अडानी और बुरा अडानी: 'लाल सलाम' वाली माकपा को क्यों बोल रही है 'वन्दे मातरम'

कई चर्चों ने लोगों से तमिलनाडु में कुडनकुलम संयंत्र के विरोध में शामिल होने का आग्रह किया। कुडनकुलम भारत में सबसे अधिक क्षमता वाला परमाणु संयंत्र है।

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पिछले दिनों केरल की राजनीति में एक दिलचस्प मोड़ आया है। सत्तारूढ़ दल माकपा और विपक्षी दल भाजपा किसी एक मुद्दे पर साथ खड़े दिखे। तिरुवनंतपुरम में तटीय मछुआरों का एक समुदाय लम्बे समय से अडानी विझिंजम अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह परियोजना का विरोध कर रहा है। वहीं भाजपा इस परियोजना के समर्थन में है। अब माकपा ने भी भाजपा के इस कदम का समर्थन किया है। 

माकपा और भाजपा के जिला नेताओं ने तिरुवनंतपुरम में परियोजना के समर्थन में आयोजित एक प्रदर्शन में भाग लिया। परियोजना का समर्थन करने वालों ने मंगलवार को राज्य सचिवालय तक एक मार्च निकाला। माकपा जिला सचिव अनवूर नागप्पन और भाजपा जिलाध्यक्ष वी वी राजेश ने जनसभा को संबोधित किया और बंदरगाह परियोजना का समर्थन करने की पेशकश की।

माकपा और भाजपा दोनों ही चर्च के नेतृत्व में चल रहे तटीय समुदाय के अनिश्चितकालीन आंदोलन की आलोचना कर रहे हैं उनका कहना है कि इस आंदोलन ने 100 दिनों से अधिक समय तक बंदरगाह निर्माण कार्य को प्रभावित किया। 

क्या है परियोजना ?

विझिंजम इंटरनेशनल ट्रांसशिपमेंट डीपवाटर मल्टीपर्पज सी-पोर्ट केरल सरकार द्वारा शुरू की गई एक महत्वाकांक्षी परियोजना है। इसे “ड्रीम प्रोजेक्ट और केरल के भाग्य के लिए गेम चेंजर” के रूप में जाना जाता है। केरल सरकार ने बंदरगाह के निर्माण और संचालन के लिए अडानी ग्रुप से अनुबंध किया है। 

भारत के दक्षिणी सिरे एवं प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग पर होने से विझिंजम बंदरगाह देश और केरल के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। बंदरगाह के चालू होने से राज्य में 17 छोटे बंदरगाहों के विकास के साथ-साथ हजारों रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद है।

क्यों हो रहा है विरोध?

20 जुलाई से मछुआरों ने इस परियोजना का विरोध शुरू हुआ। इस विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व लैटिन कैथोलिक चर्च द्वारा किया जा रहा है। चर्च ने सरकार से बंदरगाह निर्माण को रोकने और तटीय लोगों को शामिल करके इसके पारिस्थितिक प्रभाव का अध्ययन करने, संपत्ति और घरों के नुकसान के लिए उचित मुआवजा और पुनर्वास, प्रतिकूल मौसम की चेतावनी के कारण काम के दिनों को खोने वाले मछुआरों के लिए मुआवजा, सुचारू नेविगेशन सुनिश्चित करने की मांग करके विरोध शुरू किया था।

राजनीतिक दलों का पक्ष

माकपा नेताओं का कहना है कि बंदरगाह परियोजना के खिलाफ आंदोलन में शामिल लोगों द्वारा राज्य में दंगा भड़काने की कोशिश की जा रही है। इससे पूर्व केरल उच्च न्यायालय ने भी केरल सरकार को बंदरगाह निर्माण को सुरक्षा देने के निर्देश दिए थे। उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि विरोध प्रदर्शन से बंदरगाह निर्माण कार्य प्रभावित नहीं होना चाहिए। 

भाजपा शुरू से ही इस परियोजना के समर्थन में थी। भाजपा जिलाध्यक्ष वीवी राजेश के अनुसार, ‘प्रदर्शनकारियों को एक ऐसा समूह नियंत्रित कर रहा है जिसका उल्टा मकसद है। उनके निहित स्वार्थ हैं और इसलिए सरकार उनकी मांगों पर सहमति जताने के बाद भी वे आंदोलन जारी रखे हुए हैं। केंद्र और राज्य सरकार जल्द से जल्द निर्माण पूरा करने के प्रयास कर रही हैं। आंदोलन, योजना को बंद करवाने का एक प्रयास है। भाजपा इस परियोजना को पूरा सहयोग देगी।’

दरअसल, आरोप है कि लैटिन कैथोलिक चर्च विरोध प्रदर्शन को संचालित कर रहा है। ऐसे में इन घटनाओं में किसी बाहरी हस्तक्षेप की आशंकाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है। इससे पहले भी भारत में कई विकास कार्यों को लंबित रखने में चर्च की भूमिका रही है। 

चर्च एवं विकास कार्य 

कुडनकुलम संयंत्र

कई चर्चों ने लोगों से तमिलनाडु में कुडनकुलम संयंत्र के विरोध में शामिल होने का आग्रह किया। कुडनकुलम भारत में सबसे अधिक क्षमता वाला परमाणु संयंत्र है। वर्तमान में चल रहे कार्यों के बाद इस  संयंत्र की वर्तमान क्षमता 2000 मेगावाट से बढ़कर 6,000 मेगावाट हो जाएगी। विरोध के चलते हुई देरी से संयंत्र को संचालित करने में कई मुश्किलें आईं। 

स्टरलाइट कॉपर प्लांट:

विभिन्न चर्चों ने इसका विरोध किया था। वे रविवार को “विरोध दिवस” के रूप में इस्तेमाल करते थे। थूथुकुडी के तट के साथ एक बस्ती में रहने वाले कैथोलिक फर्नांडीज समुदाय के सदस्यों ने ‘अवर लेडी ऑफ स्नो’ चर्च से कलेक्टर कार्यालय तक मार्च किया।पादरी लाजर ने इस विरोध में प्रमुख भूमिका निभाई।

बेंगलुरु मेट्रो:

यह दिलचस्प है कि पहले चर्च ऑफ साउथ इंडिया (सीएसआई) को रक्षा मंत्रालय की भूमि लीज पर दी गई थी। सीएसआई ने 60 करोड़ रुपये में बेंगलुरु मेट्रो को जमीन बेची। इसके बाद ‘ऑल सेंट्स चर्च’ ने मेट्रो निर्माण का विरोध किया। इसी ‘ऑल सेंट्स चर्च’ का मुख्य निकाय सीएसआई ही है।

इस बार यह विरोध अडानी समूह तक पहुंच चुका है और दिलचस्प यह है कि अडानी का विरोध करने वालों के सुर बदले हुए हैं। 

माकपा अडानी को लेकर भाजपा के साथ क्यों?

अक्सर ,राजनीति में विपक्षी दलों द्वारा अडानी समूह के नाम को परिस्तिथि अनुसार इस्तेमाल किया जाता रहा है। वर्ष 2020 में केरल के मुख़्यमंत्री पिनाराई विजयन ने त्रिवेंद्रम एयरपोर्ट का मैनेजमेंट और ऑपरेशन का ठेका अडानी समूह को सौंपे जाने का जमकर विरोध किया था यहाँ तक कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर इसमें दखल देने की मांग भी की थी।

इससे पूर्व ठीक ऐसा ही विरोधाभास राजस्थान की गहलोत सरकार में देखा गया था। एक ओर जहाँ राहुल गाँधी केंद्र सरकार को अडानी का दोस्त बताकर सम्बोधित करते रहे और अडानी की बढ़ती सफलता को मोदी सरकार की योजना बताने का प्रयास करते रहे, वहीं इसके उलट गहलोत सरकार ने अडानी समूह के साथ 65 हज़ार करोड़ रुपए की योजनाओं का करार कर दिया। 

निवेश एवं इससे आने वाली विकास योजनाएं हर राज्य चाहता है। विपक्ष की राज्य सरकारों को भान हो गया है कि राजनीतिक हथकंडों के चलते राज्य को विकास से दूर रखना राजनीतिक रूप से नुकसानदायक हो सकता है।

एक समुदाय द्वारा लम्बे समय से किया जा रहा विरोध प्रदर्शन, राज्य में क़ानून व्यवस्था बनाने की चुनौती और हाईकोर्ट के दिशा निर्देशों के पालन करने के बीच केरल सरकार मुश्किल में नज़र आ रही है।

इसलिए केरल की वामपंथी सरकार का इस मुद्दे पर भाजपा के साथ आना माकपा की कठोरता में कमी के रूप में नहीं देखना चाहिए। इस सियायी अदावत में कमी या बढ़ोतरी समय समय पर केरल में संघ परिवार की हो रही हत्याओं में देखा जा सकता है। 

Abhishek Semwal
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