फ़रवरी 8, 2023 6:11 पूर्वाह्न

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छठ पर बस एक ही आवाज… सूरजे देवता और छठी मैया की जय

ये एक पर्व नहीं, मौका है। स्वयं से मिलने का, ईश्वर से मिलने का, घर-परिवार से मिलने का। इस त्योहार को सीमाओं में बाँधना ही गलत है। ये तो सभ्यता की जीवंत निशानी है, सूर्य सी चमकती संस्कृति है।

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छठ पर बस एक ही आवाज….सूरजे देवता और छठी मैया की जय

छठ ना बस एगो परब नै है, ई हम बिहारी लोग ख़ातिर एगो भावना है…. अब असली दिन आता था, माने की छठ का दिन। छठ के दिन भोर ही से लइका सब अइसा तैनात रहता है जैसे सीमा पर हमारे वीर जवान। पूरा घर से लेके पोखरी तक जगमग रोशनी वाला लाइट डीजे पर सब जगह शारदा सिन्हा जी के छठ गीत.. मानिये मन जैसे तृप्त हो जाता था।

बाकी एक बात मानना पड़ेगा की छठ पूजा में बिना शारदा सिन्हा के गीत के अधूरा-अधूरा सा लगता है। दिवाली से लेके छठ तक बिहार में क्या बताए एक अलगे जोश रहता है…”. 

छठ पर्व को लेकर मेरे एक दोस्त ने फेसबुक के जरिए ये शेयर किया। पोस्ट भावुक करने वाला था, इसलिए भी कि वो 4-5 सालों से छठ पूजा पर अपने घर नहीं जा पाए थे। बिहार से लेकर झारखंड, उत्तर प्रदेश, असम और नेपाल के कुछ क्षेत्र तक छठी मैया की पूजा की जाती है।

छठ पर्व के दौरान अगर आप का बिहार जाना हो तो आपको पता लगेगा कि ये मात्र पूजा नहीं है, जिसे किसी मंदिर या घर में संपन्न कर दिया जाए। ये आस्था का सैलाब है, सदियों पुरानी वैदिक पंरपरा को जीवंत रखता पर्व है। कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की चर्तुर्थी से लेकर सप्तमी तक, यहाँ की हवाएँ भी शारदा सिन्हा के गीत गाती हैं। बच्चों के हाथों में ठेकुआ की खुशबू ऐसी रची होती है जैसे बनाने में उन्हीं का सबसे बड़ा योगदान रहा हो।

छठ है क्या.. इसका सीधा सा मतलब नहाए खाए से आगाज..छठ मतलब खरना का प्रसाद, छठ घाट पर समाज का मेला, छठ मतलब व्रत और आस्था की लंबी यात्रा। 

जिस कड़कड़ाती ठंड में कोई ठंड़े पानी में नाखून भी ना लगाए वहाँ छठ व्रती घंटों पानी में खड़े रहकर सूर्य भगवान और छठी मैया की प्रार्थना करते हैं। क्यों करते हैं? कोई दबाव है नहीं…ये तो वर्ष में एक बार आने वाला त्योहार हैं। वो त्योहार जिसकी जड़ें वैदिक काल में रची बसी हैं। पौराणिक कथाओं में इस व्रत की महत्ता नजर आती है। ये चाहे राजा प्रियवंद की कथा हो, जिसमें छठी मैया ने उनकी बेटी के रूप में जन्म लिया था।

ये भी मान्यता है कि त्रेतायुग में रावण वध के बाद श्रीराम अयोध्या लौटे थे तो कार्तिक महीने में शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन ही अयोध्या में राम राज्य स्थापित हुआ था। इस दिन श्रीराम और माता सीता ने सूर्य देव की उपासना कर व्रत रखा था।

द्वापर युग में महाभारत में भी इसका जिक्र मिलता है। अंगराज कर्ण जो कि सूर्य पुत्र थे उनकी विशेष स्तुति करने के लिए जाने जाते हैं। अंगराज कर्ण प्रतिदिन सरोवर पर सूर्य भगवान को अर्घ्य देकर दान पुण्य किया करते थे। साथ ही, मान्यता है कि महाभारत के समय ही द्रोपदी ने अपने परिवार के कष्टों के निवारण के लिए छठ पूजा की थी। 

छठ तो बहाना है अपने गाँव वापस लौटने का। बिहारी अपने जन्मदिन के दिन भले ही गाँव ना आए लेकिन छठ को वो घर से दूर नहीं रह सकता। ये पर्व साथ लाता है घर परिवार, नाते-रिश्तेदार, दूर काम कर रहे किसी माँ के बेटे या बेटी को।

नाक से लेकर माँग तक भरा सिंदूर, आँखों में श्रद्धा से भरे आँसु और अपार आस्था के साथ व्रती महिलाएं घंटों नदी में खड़ी होकर सूर्य भगवान की उपासना करती है। 

आप गौर करिए कि 4 दिन चलने वाले पर्व में  खरना का प्रसाद, ठेकुआ और कई पूजा संपन्न करने के बाद भोर अर्घ्य तक निर्जला व्रत और फिर घंटों ठंडे पानी में उपासना…कैसे कर लेती हैं ये व्रती महिलाएं? आपकी आस्था जो भी हो, क्या ये किसी अलौकिक शक्ति का अहसास नहीं कराती? लोक मान्यता तो यही है कि छठी मैया इन व्रतियों का ध्यान रखती है। 

अरे कोई मिलावट ही नहीं है.. छठ तो वही है जो वैदिक काल से मनाई जा रही थी। आधुनिकता का चश्मा अभी इस पर नहीं चढ़ा है। आज भी नहाए खाए से व्रती महिलाएं बाल धोकर लौकी-भात का प्रसाद बनाती है। खरना को गुड़ की खीर खाकर जमीन पर सोती है..क्यों सोती है?

क्योंकि संस्कृति आज भी यहाँ सांस ले रही है। व्रती माताओं को याद है कि वनवास के दौरान माँ सीता जब छठ माँ का व्रत रखती थी तो जमीन पर सोती थी, उनके पास कहाँ राज-पाट था? बस, इसी परंपरा को ये आज भी जीवंत रखे हुए है। 

छठ व्रती, जो ईश्वर के करीब..ईश्वर के अपने माने जाते हैं। इसलिए कहा जाता है कि भोर अर्घ्य के समय इनके पैर छूने चाहिए, बहुत पुण्य मिलता है।

आप किसी भी पूछ लें कि भई छठ त्योहार में क्या होता है, जवाब की पहली पंक्ति तो यही होगी कि “देखिए ई त्योहार ना है, ई एक भावना है, परिवार से मिलन का मौका है और हमारी आस्था का संगम है।” 

घाट पर हाथ जोड़े व्रती महिलाएँ, हाथ में ठेकुआ लिए दौड़ते बच्चों के साथ शारदा सिन्हा के गीत बजते रहते हैं। ये खास है और ये ऐसा ही..आज से नहीं वर्षों से। ये वो दिन होते हैं जब सब परिवार के लोग साथ होते हैं, बाजार तो खाली होते ही हैं, भीड़ तो सिर्फ वहाँ होती है जहाँ छठी मैया पूजी जाती हैं। 

ये एक पर्व नहीं, मौका है। स्वयं से मिलने का, ईश्वर से मिलने का, घर-परिवार से मिलने का। इस त्योहार को सीमाओं में बाँधना ही गलत है। ये तो सभ्यता की जीवंत निशानी है, सूर्य सी चमकती संस्कृति है।

जब नदी में खड़ी महिलाएँ सूर्य उपासना करती हैं तो लगता है कि नदी के साथ सूर्य भगवान और छठी मैया से उनका मिलन हो रहा हो। ये अद्भुत है, अलौकिक, पर-प्राकृतिक है। इसकी विशालता बनी रहनी चाहिए। इसी भावना के साथ हम यही कह सकते हैं कि छठी मैया हम सब पर कृपा करें। 

“जय छठी मैया

सबहन पे कृपा बना के रखिह सूरजे देवता”

Pratibha Sharma
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