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5G के बीच आज कितना प्रासंगिक रह गया डाक विभाग: आज ही हुई थी स्थापना

वर्तमान समय में डाक विभाग एक भरोसेमंद विभाग के तौर पर देखा जाता है। इस बात को तब और अधिक स्वीकार्यता मिली जब कोरोनाकाल में डाक विभाग ने दवाईयाँ एवं कोरोना मेडिकल किट भी घर-घर तक पहुँचाई।

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खेतों में काम करते किसानों और दूर गाँव में मजदूरी करते हुए पिता के लिए एक चिट्ठी आती थी। कई भावनाएँ समेटे उस कागज़ के टुकड़े को लाने वाला कहलाता था ‘डाकिया’

डाकिया, जो उस दौर में किसी देवता से कम नहीं था। जी, हाँ! हम बात कर रहे हैं, उस दौर की जो टीवी के हो-हल्ला, मोबाइल की रिंगटोन और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस जैसे विज्ञान से कोसों दूर था। जहाँ संचार का सिर्फ एक मुख्य माध्यम हुआ करता था- डाक विभाग, भारतीय डाक विभाग। 

भारतीय डाक व्यवस्था ने आज के उन्नत एवं वृहद्  स्वरुप को हासिल करने के लिए सैकड़ों साल का सफर तय किया है। आज से 168 वर्ष पूर्व, 1854 को आज ही, यानी 1 अक्टूबर के दिन भारत में डाक विभाग की स्थापना हुई थी। इससे पूर्व भी डाक व्यवस्था थी, लेकिन एक अलग विभाग के रूप में स्थापित नहीं था। 

भारत में डाकघरों की शुरुआत ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के दौरान हुई थी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने वर्ष 1727 में पहला डाकघर स्थापित किया था। इसके बाद वर्ष 1774 में कलकत्ता डाकघर स्थापित किया गया। यह डाकघर विलियम फोर्ट परिसर में ही था। इसी क्रम में, वर्ष 1786 में मद्रास तथा 1794 में बॉम्बे डाकघर की स्थापना की गई। 

इस व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता को लॉर्ड डलहौज़ी ने समझा एवं उन्होंने वर्ष 1850 आते-आते एक भारतीय डाक सेवा समिति का गठन भी किया। 

समिति की अनुशंसाओं के अनुसार, ब्रिटिश राज को सुचारु रूप से चलाने के लिए डाक व्यवस्था राष्ट्रीय महत्व का विषय था एवं इसके लिए लिए अलग विभाग की आवश्यकता थी। परिणामस्वरूप, 1 अक्टूबर 1854 को हेनरी फिलिप की अध्यक्षता में देश के 700 डाकघरों को एक अलग विभाग, ‘भारतीय डाक विभाग’ के अन्तर्गत लाया गया।

विश्वयुद्ध के दौरान भी डाक विभाग की भूमिका अहम रही। दरअसल ,सैनिकों और उनके प्रियजनों के बीच होने वाला पत्राचार बहुत जरूरी था, जो युद्ध पर गए सैनिकों के लिए स्वयं में एक हथियार था। (वर्ष 1972 से भारत में ‘सेना डाक सेवा’ एक अलग विभाग के रूप में काम करता है )

दुनिया की पहली हवाई डाक सेवा भी भारत के नाम है 1911में प्रयागराज कुम्भ के दौरान फ्रेंच पायलट हेनरी पिकेट ने विमान में 6500 पोस्टकार्ड लेकर उड़ान भरी थी।

डाक टिकट की रही अहम भूमिका

डाक टिकट चिपकने वाले कागज से बना एक साक्ष्य है जो यह दर्शाता है कि डाक सेवाओं के शुल्क का भुगतान हो चुका है। ब्रिटिश भारत की पहली डाक टिकट वर्ष 1852 में जारी की गई थी, जो गोलाकार थी एवं इस पर ‘सिंध डिस्ट्रिक्ट डॉक’ लिखा था। यह क्षेत्र वर्तमान में पाकिस्तान में है।

विश्व की पहली डाक टिकट ‘पैनी ब्लैक’ थी, जो ब्रिटिश शासन में प्रयोग की जाती थी। यह टिकट भारतीय डाक व्यवस्था में 1901 से प्रयोग में लाई गई।

जबकि, स्वतंत्र भारत की पहली डाक टिकट 21 नवंबर को जारी की गई, जिस पर भारतीय ध्वज के साथ ‘जय हिन्द’ लिखा हुआ था। इसकी कीमत लगभग ‘चार आना’ तय की गई थी। 

वर्तमान डाक विभाग 

ब्रिटिश भारत की डाक प्रणाली उनके सामरिक और व्यापारिक हितों पर केंद्रित थी, लेकिन स्वतंत्र भारत में  हमारी डाक प्रणाली को जन साधारण की आवश्यकताओं को केंद्र में रख कर विकसित करने का नया दौर शुरू हुआ। 

भारतीय डाक विभाग सिर्फ पत्राचार तक ही सीमित नहीं रहा। वक़्त के साथ ये विभाग भी नई तकनीक एवं ग्राहकों की माँग के अनुसार कार्य क्षेत्र का विस्तार करता रहा।

भारत में है एकमात्र तैरता हुआ डाकघर 

भारत में एक डाकघर ऐसा भी है जो तैरता है। श्रीनगर (कश्मीर) स्थित डल झील में तैरता हुआ यह डाकघर वर्ष 2011 में स्थापित किया गया था। यह एक सक्रिय डाकघर है, जो न केवल स्थानीय लोगों द्वारा पत्रों को पोस्ट करने के लिए, बल्कि बड़े पैमाने पर पर्यटकों द्वारा भी देखा जाता है। खास बात  ये है कि इसके लिए डाकिया शिकारे की यात्रा कर चिट्ठियों को पहुँचाता है।

विश्व का सबसे अधिक ऊँचाई पर मौजूद डाकघर

इसी प्रकार, हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले के हिक्किम गाँव में विश्व का सबसे अधिक ऊँचाई पर स्थित डाकघर है। पिछले 39 सालों से हिक्किम डाकघर में तैनात रिंचेन छेरिंग बताते हैं कि वे वर्ष 1983 को डाक विभाग में सेवाएँ दे रहे हैं। यहाँ तक कि उन्हें बर्फबारी के दौरान डाक पहुँचाने के लिए 10 से 12 फीट बर्फ के बीच पैदल चलना पड़ता है।

ऐसे ही दूरस्थ स्थानों और वहाँ रहने वाले लोगों तक बड़ी आसानी से वित्तीय सेवा पहुँचाने के लिए सरकार ने वर्ष 2018 में डाक व्यवस्था में महत्वपूर्ण कदम उठाया।

भारत सरकार ने ‘इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक’ (IPPB) का शुभारंभ किया। चूंकि, IPPB डिजिटल लेन-देन की सुविधा भी प्रदान कर रहा है, जिसे वित्तीय समावेश की दिशा में एक बड़ी पहल माना गया। 

देश के हर कोने में फैले डाक विभाग के 3,00,000 से अधिक डाकियों और ग्रामीण डाक सेवकों का विशाल नेटवर्क इस कार्य को कर रहे हैं।  

वर्तमान समय में डाक विभाग एक भरोसेमंद विभाग के तौर पर देखा जाता है। इस बात को तब और अधिक स्वीकार्यता मिली जब कोरोनाकाल में डाक विभाग ने दवाईयाँ एवं कोरोना मेडिकल किट भी घर-घर तक पहुँचाई। 

डाकिया लंबे समय से गाँवों में एक सम्मानित और स्वीकार्य व्यक्ति रहा है और आधुनिक तकनीकों द्वारा दस्‍तक देने के बावजूद डाकिया पर भरोसा अब भी बना हुआ है।

यह संयोग नहीं है कि आज हम संचार के महत्वपूर्ण माध्यम डाक विभाग का स्थापना दिवस मना रहे हैं एवं दूसरी ओर प्रगति मैदान दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी टेलीकॉम क्षेत्र में 5G की सेवाएँ शुरू कर रहे हैं। जो भारत के दृष्टिकोण से संचार क्रांति में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।

अभिषेक सेमवाल
अभिषेक सेमवाल
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