सितम्बर 26, 2022 5:57 अपराह्न

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येरूशलम की अल-अक्सा मस्जिद और 1969 के गुजरात दंगे

येरुशलम की जो अल अक्सा मस्जिद चर्चा में बनी हुई है उसका 1969 के गुजरात दंगों से क्या सम्बन्ध है?

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येरुशलम की जो अल अक्सा मस्जिद चर्चा में बनी हुई है उसका 1969 के गुजरात दंगों से क्या सम्बन्ध है? 21 अगस्त 1969 का दिन था, जब ऑस्ट्रेलिया के डेनिस माइकल रोहन नाम के एक ईसाई मिशनरी ने अल अक्सा में आग लगा दी थी। रोहन का मानना था कि अल-अक्सा को जलाने से Second Coming of Christ करीब आ जाएगी और टेम्पल माउंट पर यहूदी मंदिर के पुनर्निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा।

इसी घटना के जवाब में, सऊदी अरब के तत्कालीन सुल्तान शाह फैसल ने आनन फानन में एक महीने के भीतर विश्व भर के इस्लामिक देशों का एक सम्मेलन मोरक्को में बुलाया जिसमें 25 मुस्लिम देशों के अध्यक्ष शामिल हुए और यही सम्मेलन OIC यानी इस्लामिक सहयोग संगठन बना। आश्चर्य है कि हिन्दुओं का एक आधिकारिक राष्ट्र नहीं है, पर उन्हें साम्प्रदायिक कहा जाता है और वहीं दूसरी ओर गैर लोकतान्त्रिक तानाशाही मुल्कों की उम्मा बनाने वालों को विक्टिम कह जाता है!

मुस्लिम उम्मा ने इस अल-अक्सा अग्निकाण्ड का खिलाफत आन्दोलन के बाद सबसे तगड़ा विरोध किया और विश्व भर में अल-अक्सा काण्ड के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन किए गए।

भारत भी इस हिंसक प्रदर्शनों से अछूता नहीं रहा और देशभर में इस्लामिक संगठनों ने प्रदर्शन किए जिसमें साम्प्रदायिक व भड़काऊ बातें कही गयीं और कहा गया “जो हमसे टकराएगा मिट्टी में मिल जाएगा।” जिस प्रकार तुर्की के खलीफा के लिए भारत में दंगे करवाए गए थे उसी प्रकार इजरायल की घटना के लिए भारत में फिर से हिंसक प्रदर्शन किए गए।

29 अगस्त 1969 को कलकत्ता में 5 लाख हरित प्रदर्शनकारियों ने अशान्तिकारक रैली निकाली। घटना के दसवें दिन 31 अगस्त को अहमदाबाद में भी अल अक्सा काण्ड के नाम पर बहुत बड़ा उग्र जुलूस निकाला गया।

इस घटना की पृष्ठभूमि में ध्यान रखने वाली बात है कि ‘जमीयत उलेमा ए हिन्द’ कई महीने पहले से ही अहमदाबाद में साम्प्रदायिक विष घोलने का काम कर रही थी जिसकी आग में घी डालने का काम इस जुलूस ने किया। ध्यान दें तब संचार के आज जैसे साधन नहीं थे, तथापि मजहब के नाम पर राजनीतिक पार्टी की तरह छोटे से नोटिस पर विश्वभर में बड़ी-बड़ी रैलियाँ प्रदर्शन झड़पें की जा रही थीं। कानपुर से लेकर कलकत्ता तक की जमातों द्वारा संयुक्त राष्ट्र को पत्र लिखे गए थे।

आम तौर पर शान्त रहने वाले गुजरात को आग में झोंका गया था, फिर तो सिलसिला ही चल पड़ा, तत्कालीन समाचारों के अनुसार 4 सितम्बर को एक मजहबी पुलिस वाले ने रामलीला में रामायण जमीन पर गिराकर लात मार दी। अल अक्सा काण्ड से निर्मित हुई सारी परिस्थिति पर संघ के सरसंघचालक गुरू गोलवलकर स्वयं नजर रखकर हिन्दू समाज का मार्गदर्शन कर रहे थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की धर्म रक्षा समिति और भारतीय जनसंघ ने रामायण के अपमान का व्यापक विरोध किया और माफ़ी मांगने पर मजबूर किया।

परन्तु 18 सितम्बर को हिन्दुओं के अत्यन्त पवित्र स्थान अहमदाबाद के 400 साल पुराने श्रीजगन्नाथ मन्दिर में कुछ पांथिक उग्रवादियों ने साधुओं से मारपीट करके मन्दिर में तोड़फोड़ की, दूसरे दिन भी हमला किया। अहमदाबाद में मजहबी उग्रवादियों ने सुनियोजित दंगा किया। यह हिंसा गुजरात के सबसे बड़े दंगों था में से एक थी जिसमें बड़े पैमाने पर नरसंहार, आगजनी और लूटपाट शामिल थी।

उस समय हुए दंगे में हज़ारों लोग मारे गए थे, हिन्दुओं के जान माल का बहुत नुकसान हुआ था। तब इस घटना से सर्वाधिक प्रताड़ित हिन्दू धर्मावलम्बी हुए थे और उनके हस्तक्षेप के बाद दंगा समाप्त हुआ था। 

यह दंगे कांग्रेस के मुख्यमन्त्री हितेंद्र देसाई के काल के दौरान हुए थे। कांग्रेस की सरकार निरन्तर तुष्टीकरण की घिनौनी राजनीति करती रही और हिन्दुओं से सौतेला व्यवहार करती रही, उनकी सरकार द्वारा स्थापित जस्टिस रेड्डी आयोग ने हिंसा के लिए हिंदू संगठनों को एकतरफा रूप से जिम्मेदार ठहराया। संघ के अधिकारियों व हिन्दूओं पर झूठे आरोप मढ़कर गिरफ्तारी और दंगों की आड़ में संघ पर प्रतिबन्ध का षड्यंत्र रचा जिसे तत्कालीन संघ प्रचारक वकील साहब ने विफल किया था। कांग्रेस के उसी छद्म सेकुलरिज्म का प्रतिबिम्ब है विकीपीडिया का पेज जिसपर बड़ी धूर्तता से दंगे का पूरा जिम्मेदार हिन्दू समाज को ठहराया गया है और मजहबियों का खरगोश के समान मासूम चित्रण किया गया है।

आज भी ऐसी ही परिस्थिति अनेक बार देखने को मिलती है जब इजरायल में अल-अक्सा की कोई घटना होने पर भारत में दंगा किया जाता है, म्यांमार के रोहिंग्या के लिए भारत में शहीद स्मारक तोड़ा जाता है, पर तालिबान द्वारा 5 दर्जन बच्चों की हत्या पर चुप्पी साध ली जाती है। पर इस तरह की अराजकतावादी घटनाओं से भारत का शीर्ष नेतृत्व अवगत व सतर्क है।

ऐसा इसलिए हम कह रहे हैं क्योंकि उपरोक्त लेख की जानकारियों का मूलस्रोत है स्वयं प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी द्वारा लिखित पुस्तक ”सेतुबन्ध”। इस पुस्तक में नरेन्द्र मोदी ने अपनी प्रतिज्ञा भी लिखी है, “हिन्दूराष्ट्र के हम सभी अंग-प्रत्यंग हैं और इस राष्ट्र को परम वैभव प्राप्त कराने के लिए संगठित करने का वीरव्रत हमने लिया है। हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति और हिन्दू समाज की रक्षा कर।

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One Response

  1. मज़हबी जिहादी प्रवृत्ति के कारण ही इस तरह के मजहबी दंगों में हिंदू समुदाय को अधिक क्षति उठानी पड़ती रही है । मीडिया संस्थानों, प्रशासन एवं सरकारों में मज़हबी मानसिकता के लोगों की सहायता से इन जिहादी तत्वों को दंगो के पश्चात पीड़ित दर्शाया जाता है ।

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