फ़रवरी 4, 2023 1:28 अपराह्न

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पुस्तक समीक्षा: मछुआरों की बस्ती को सिंगापुर में बदलने वाले ली कुआन | From Third World to First

ली मुक्त-बाजार के समर्थक थे, समाज सुधारक थे, घनघोर कम्युनिस्ट-विरोधी थे और व्यक्ति की स्वतंत्रता से ऊपर समाज के हित को रखने वाले व्यक्ति थे। मलेशिया से सिंगापुर के अलग होने के बाद से उन्होंने देश की कमान संभाली।

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फ्रॉम थर्ड वर्ल्ड टू फर्स्ट

ली कुआन यू कई मायनों में सदी के नायक कहे जा सकते हैं। एक छोटी सी मछुआरों की बस्ती, सिंगापुर को बदल कर आज का आधुनिक सिंगापुर बना देने का श्रेय उन्हीं को जाता है। कई किताबों में एक आम राजनीतिज्ञ की तरह आप उनकी जीवनी पढ़ सकते हैं। लेकिन ये किताब ‘फ्रॉम द थर्ड वर्ल्ड टू द फर्स्ट’ (From Third World to First) व्यक्ति पर नहीं, एक देश पर आधारित है। ऐसे में ली के काम से क्या बदला और कैसे बदला, इस पर यहाँ ज्यादा ध्यान दिया गया है।

ली मुक्त-बाजार के समर्थक थे, समाज सुधारक थे, घनघोर कम्युनिस्ट-विरोधी थे और व्यक्ति की स्वतंत्रता से ऊपर समाज के हित को रखने वाले व्यक्ति थे। मलेशिया से सिंगापुर के अलग होने के बाद से उन्होंने देश की कमान संभाली। किताब तीन हिस्सों में है, पहला भाग सिंगापुर के प्रशासन पर है। दूसरा भाग स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर है, और तीसरा भाग उनका व्यक्तिगत, पारिवारिक जीवन से सम्बंधित है।

उनके प्रशासनिक सुधारों की क्षमता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके प्रयासों से करीब 90% सिंगापुर के लोगों के पास अपनी संपत्ति, अपना घर है। सिंगापुर की ये तरक्की किसी किस्मत के पलटने का नतीजा नहीं था। रातों रात वहां कोई तेल की खदानें नहीं निकल आई थी। ये बरसों की योजनाबद्ध मेहनत का नतीजा था। ली ये मानते हैं कि लगभग सभी उपनिवेशों ने गुलामी से छूटते ही लोकतंत्र अपनाया।

उनके अंतरराष्ट्रीय मामलों की समझ भी उनके समय से काफी आगे की है। आज के भारत में जिस ‘राष्ट्रीय चरित्र’ की चर्चा चल रही है, उस पर ली के विचार कम शब्दों में क्रन्तिकारी कहे जाएँगे। अगर आपकी अंतरराष्ट्रीय मामलों में समझ या रूचि मेरे जितनी ही कम हो तो भी इसे पढ़ना उतना बोझिल नहीं लगता। ये किताब सन 2000 में लिखी गई थी और अब तो ली दिवंगत भी हो चुके हैं, लेकिन उनके लिखे से सीखने के लिए करीब दो दशक बाद भी काफी कुछ बाकी है।

ली के मुताबिक लोकतान्त्रिक देश तब तक तरक्की नहीं कर सकता है, जब तक उसका मध्यमवर्ग तरक्की नहीं करता। शिक्षित और मेहनतकश जनता को उनकी क्षमता, उनकी योग्यता के मुताबिक जब तक काम नहीं मिलता, तब तक विकास नक्शों से जमीन पर नहीं उतरेगा।

उनके इन विचारों को काफी हद तक प्लेटो के ‘रिपब्लिक’ से प्रेरित भी माना जाता है। उनके हिसाब से जो देश खुद को दुनियां के मंच पर किसी काम का सिद्ध कर सकते हैं वो निश्चित रूप से अन्य देशों से कामयाब भी सिद्ध होंगे।

अरे हाँ, किताब में जगह-जगह भारत से तुलना भी है और अगर नहीं भी लिखी हो तो आप खुद ही कर पाएँगे। खुद पढ़िए और अभी और क्या क्या होने वाला है देश में, उसका अंदाजा लगाइए। कब होगा, ये तो आप नहीं मालूम कर पाएँगे, लेकिन क्या होगा, यह तो आपको पक्का पता रहेगा।

Anand Kumar
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