सितम्बर 27, 2022 8:00 पूर्वाह्न

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नई भाषाई चुनौतियों के बीच पाकिस्तान

विद्वतजनों का मानना है कि भाषा के विकास और विस्तार के लिए उसका लिपिबद्ध होना आवश्यक होता है, ताकि उसे पढ़ा जाए, लिखा जाए। इसका सबसे सरल और प्रभावी माध्यम अखबार माना जाता है।

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बांग्लादेश-पाक

भारत-विभाजन की जब भी चर्चा होती है, तो बंटवारे के दर्द के साथ ही भाषा का सवाल भी मुंह बाए खड़ा हो जाता है।


भाषा मात्र लिखने-पढ़ने तक सीमित नहीं है। भाषा का प्रश्न पहचान का प्रश्न है। भाषा व्यक्ति के अस्तित्व का परिचायक है। भाषा का दमन, देश-समाज के विभाजन का कारक है।


भाषाई आधार पर उत्पीड़न का परिणाम बांग्लादेश है। पूर्वी पाकिस्तान कहे जाने वाले बांग्ला भाषी क्षेत्र पर जब जबरन उर्दू थोपी गयी, तो भाषा के आधार पर एक आन्दोलन खड़ा हुआ। यही भाषाई आन्दोलन विकराल हो गया, जिसने वर्ष 1971 में एक नए देश को जन्म दिया।

बांग्लादेश और अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस:

मोहम्मद अली जिन्ना ने 1948 में घोषणा की थी कि उर्दू पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषा होगी। इसका विरोध होना भी तत्काल ही शुरू हो गया। बाद में तो इसकी आंच इतनी तेज हुई कि पाकिस्तान को एक और बंटवारा झेलना पड़ा।

21 फरवरी, 1952 को ढाका विश्वविद्यालय के बंगाली छात्रों ने इसके विरोध में जुलूस निकाला। विरोध रोक पाने में असफल रहने पर पाकिस्तानी पुलिस ने छात्रों पर गोलियां बरसा दी। इस विरोध प्रदर्शन में कई छात्र अपनी मातृभाषा के रक्षार्थ बलिदान हो गए।

पाकिस्तानी लोगों का एक बड़ा तबका मानता था कि उर्दू मुहाजिरों यानी भारत से आए शरणार्थियों की भाषा है और इसका कोई तुक नहीं है कि देश शरणार्थियों की भाषा को राष्ट्र-भाषा के रूप में स्वीकार करे।

21 फरवरी ‘अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस’ के रूप में दुनिया भर में मौजूद विभिन्न भाषाओं की विविधता को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है। इसका उद्देश्य विश्व में भाषाई एवं सांस्कृतिक विविधता और बहु-भाषावाद को बढ़ावा देना है। यह दिन उन बलिदानी छात्रों को समर्पित है, जिन्होंने बांग्ला के लिए पूर्वी पाकिस्तान में मुहिम छेड़ी थी। बांग्लादेश में यह दिन ‘भाषा आन्दोलन दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

भाषा के सवाल पर भले ही पाकिस्तान के दो टुकड़े हुए, लेकिन आज भी वहां यह सवाल बड़ा है।

भाषा के आधार पर पाकिस्तानी जनसंख्या:

पाकिस्तान सांख्यिकी ब्यूरो ने साल 2017 में जनसंख्या से सम्बन्धित आंकड़े प्रस्तुत किए थे। इन आंकड़ों के अनुसार पाकिस्तान में सबसे अधिक 80.5 मिलियन पंजाबी भाषा बोलने वाले लोग हैं।

इसके बाद पश्तो और सिंधी बोलने वाले लोग क्रमश: 37.9 और 30.3 मिलियन हैं। सराइकी बोलने वाले 25.3 मिलियन लोग हैं। पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषा उर्दू पांचवे नम्बर पर है, जिसे बोलने वाले लोगों की संख्या मात्र 14.7 मिलियन है।

इसके अलावा बलूची और हिन्दी को बोलने वाले लोगों की संख्या 6.3 और 4.7 मिलियन है। ब्राहुई और कश्मीरी भाषा बोलने वालों की संख्या 2.6 व 0.4 मिलियन है।

हकीकत यह है कि पाकिस्तान में किसी भी इलाके को मूल रूप से उर्दू बोलने वाले क्षेत्र के रूप में नहीं माना जाता। उर्दू बहुमत की भाषा नहीं है, फिर भी पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषा है।

मातृभाषा को लेकर शिक्षाविदों और संयुक्त राष्ट्र का क्या मत है?

विश्वभर के शिक्षाविदों का मानना है कि बच्चे अपनी मातृभाषा में बेहतर सीखते और सृजन करते हैं। इसी उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2022 से 2032 के बीच की अवधि को स्वदेशी भाषाओं के अन्तरराष्ट्रीय दशक के रूप में नामित किया है। इसके उलट पाकिस्तान को लगता है कि मातृभाषा के दमन से उर्दूकरण को मजबूती मिलेगी। इससे इस्लामी देश होने की छवि का तिलिस्म बरकरार रखा जाए।

उर्दू के इस तिलिस्म को बनाए रखने के लिए पाकिस्तान ने वहां की स्थानीय भाषाओं की लिपियों को ही बदल दिया है। पढ़ने-लिखने से सम्बन्धित सभी प्रोजेक्ट नस्तालकी लिपि में बदल दिए गए।

विद्वतजनों का मानना है कि भाषा के विकास और विस्तार के लिए उसका लिपिबद्ध होना आवश्यक होता है, ताकि उसे पढ़ा जाए, लिखा जाए। इसका सबसे सरल और प्रभावी माध्यम अखबार माना जाता है।
पाकिस्तान में उर्दू के अलावा अन्य भाषाओं के नाम से अखबार निकलते तो हैं लेकिन लिपि नस्तालकी ही है। इस लिपि में फारसी और उर्दू लिखते हैं।

पंजाब प्रान्त से ‘शान-ए-गुजरात’ अखबार प्रकाशित होता है। नैतिकता के आधार पर तो होना चाहिए था कि पाठकों को गुजराती भाषा में समाचार पढ़ने को मिले। विडम्बना ऐसी कि इसकी लिपि नस्तालकी यानी अरबी-फारसी का मेल है।

यह दमन न केवल गुजराती भाषा का हुआ है बल्कि तमाम स्थानीय भाषाओं का यही हाल है। आखिरी बार स्थानीय भाषा में कब-क्या लिखा या पढ़ा गया हो इसकी खबर दूर-दूर तक नहीं।


पाकिस्तान के समक्ष आज भी है पहचान का संकट:

पाकिस्तान सांस्कृतिक रूप से आज भी भारत का ही हिस्सा है। इसे नकारने के लिए पिछले 7 दशकों से पाकिस्तान अनवरत स्वयं को भारत से भिन्न दिखाने की कोशिश करता रहा है।

पाकिस्तान में आज भी भारत की प्रमुख भाषाओं और बोलियों को बोलने और समझने वाले लोग मौजूद हैं। इनमें हिंदी, पंजाबी, हरियाणवी जैसी भाषाएं शामिल हैं। भारतीय भाषाओं पर आधारित अनेक कार्यक्रम विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और यू-ट्यूब पर मौजूद हैं। पाकिस्तानी रेडियो ‘सुनो FM 89.4’ पर हरियाणवी कार्यक्रम आज भी चलते रहते हैं।

Jayesh Matiyal
Jayesh Matiyal

जयेश मटियाल पहाड़ से हैं, युवा हैं और पत्रकार तो हैं ही।
लोक संस्कृति, खोजी पत्रकारिता और व्यंग्य में रुचि रखते हैं।

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