सितम्बर 27, 2022 5:21 पूर्वाह्न

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गरीब के जीवन में साधन की महत्ता बताते हुए यह फिल्म देश की नई तस्वीर सामने नहीं रखती

ट्रेलर ने जो कंटेंट इंगित किया है, उससे एक बात सामने आती है कि क्या आर्ट सिनेमा यानी पैरेलल सिनेमा में गरीब, भूखा, भारत ही है। समर्द्ध भारत की कहानी नहीं आ सकती है। कुछ तो बदलाव आया होगा, इन कंटेंट को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर डोनेशन मिल जाता है।

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Film review: Matto Ki Saikil

डिस्ट्रीब्यूटर्स व एग्जीबिटर्स भी इन कंटेंट में कम ही दिलचस्पी रखते है। दरअसल, हीरो-हिरोइन का जो हौवा खड़ा कर रखा है न! ऐसी फिल्मों को बड़े आराम से निगल जाता है। सबको मुनाफ़ा चाहिए, जहाँ से पैसे निकलेंगे, वही दांव लगाएंगे।

देखिए न और समझिए! निर्देशक ने अपनी इस फ़िल्म के लिए लेखक-निर्देशक प्रकाश झा को केंद्र में चुना है। फ़िल्म का प्लॉट ब्रज में रखा है और प्रकाश ने अपने किरदार को भी अच्छे से पकड़ लिया। ऐसा ट्रेलर दिखलाकर गया है। इस कंटेंट को कॉमर्शियल फॉर्मेट में कतई न रखा जाएगा।

कोई बड़ा चेहरे वाला हीरो होता, इसके मर्म को खा जाता। कहानी से बड़ा उसका नाम होता, ऐसे में कलाकार ही कहानी को पूर्ण सम्मान व स्पेस देता है और कहानी के अनुरुप चलता है न कि कहानी को चलाता है।

लेखक-निर्देशक विकास बहल ने बिहार के आनंद कुमार यानी सर को सिनेमाई बॉयोपिक दी। तब उन्होंने ठेठ बिहारी एक्सेंट व आनंद कुमार से मिलने ग्रीक गॉड की उपाधि प्राप्त ऋतिक रोशन को भेजा। निर्माताओं की शर्त व प्रॉफिट कमाने की लालसा, हर व्यक्ति की होती है, इसमें कोई दोराय नहीं है।

बॉलीवुड अभिनेता को आनंद से मिलने के लिए माईनस में मेकअप करना पड़ा और डायलॉग में खासी समस्या आई। सीधे शब्दों में कहे, निर्देशक-निर्माता की कॉमर्शियल जिद के कारण आनंद कुमार ठीक से 70एमएम पर न आ सके।

अगर प्रकाश झा जैसे चेहरे को उनसे मिलने भेजा जाता तो यकीनन, आनंद कुमार को अपनापन फील होता और खुलकर दर्शकों के समक्ष आते। आर्थिक पटल पर निर्माताओं को निराशा मिलती, हालांकि उस स्थिति में बजट सीमित रहता।

सुपर 30 फ़िल्म ने निर्माताओं की इच्छा को पूर्ण किया और कॉमर्शियल स्टेटस में “हिट” लिखवाकर निकली।

निर्देशक एम घनी की फ़िल्म विभिन्न सिनेमाई मेलों में खूब अवॉर्ड व स्टैंडिंग ओबेशन हासिल कर लेगी और ऐसे कंटेंट करते है। आर्थिक मामले में नील बट्टे सन्नाटा रहेगा, ओटीटी से बजट निकल जाएगा। उस जगह दर्शक भी मिलेंगे।

नज़दीकी सिनेमाघरों में मुश्किल है। बशर्ते बेहतरीन और उम्दा प्रमोशन डिजाइन हो, दर्शक को नोटिफिकेशन भेज सके। निर्माता और निर्देशक ऐसा करेंगे नहीं, बजट बढ़ेगा।

मेरा सजेशन है निर्माता सिर्फ़ समाजवादी पार्टी के मुखिया से मिल ले और उन्हें स्पेशल सक्रीनिंग में आमंत्रित करे। बहुत फायदा होगा, 2022 उत्तर प्रदेश चुनाव में उन्होंने ’22 में बाइसकिल’ थीम पर चुनाव लड़ा था। नतीजों में साइकिल पंचर रही। लेकिन रुझान मने रैली में खूब भीड़ जुटा ली।

अखिलेश जादो मत्तो की साइकिल को लाल टोपी से जोड़ दे, तो कोई माई का लाल रोक न सकता है। फिर फ़िल्म स्वयं कहेगी “हाऊ कैन रोक?”। वैसे अखिलेश जादो आधिकारिक तौर पर साइकिल के चीफ़ है। वे निर्माताओं से रॉयल्टी वसूल सकते है पूरा अधिकार है।

ट्रेलर ने जो कंटेंट इंगित किया है, उससे एक बात सामने आती है कि क्या आर्ट सिनेमा यानी पैरेलल सिनेमा में गरीब, भूखा, भारत ही है। समर्द्ध भारत की कहानी नहीं आ सकती है। कुछ तो बदलाव आया होगा, इन कंटेंट को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर डोनेशन मिल जाता है।

पश्चिमी देशों को गरीब, भूखा, नंगा भारत ही पसंद आता है। बाकी रिमोट रूरल एरिया में चले जाओ, तस्वीर बदली है। बहुत कम रेश्यो है साइकिल पर चल रहे है। बाइक ओभर टेक कर चुकी है। मत कह देना कि टोटी भैया साइकिल पर चलते है। भिया उनकी साइकिल बीएमडब्ल्यू से निर्मित है। कीमत में 60-70 हजार लिखा होता है।

ट्रेलर का एक सीक्वेंस यूपी की सियासत को हाई-लाइट कर जाता है। मत्तो साइकिल खड़ी करके, सब्जी का भाव ले रहा होता है। कि तेजी से जिप्सी आती है और साइकिल को बिखेर जाती है। मत्तो को समझ न आता है क्या हुआ?

इसे देखकर 2014, 2017, 2019 और 2022 की सभी तस्वीरें एक साथ ताजा होती चली जाती है।😊मैसेज है दर्शकों के लिए लेखक-निर्देशक की तरफ से।

यह लेख ओम लवानिया द्वारा लिखा गया है

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