फ़रवरी 2, 2023 12:33 पूर्वाह्न

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कर्मचारी या नियोक्ता, किस के अधिकारों का हनन है 'मूनलाइटिंग'

हाल ही के दिनों में आपने मूनलाइटिंग की चर्चा सुनी होगी। क्या यह सच में नियोक्ता के साथ धोखा है या कर्मचारियों के लिए उचित है।

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मूनलाइटिंगः कर्मचारियों द्वारा धोखा या समय की जरूरत

आईटी कंपनी विप्रो ने एक साथ 300 कर्मचारियों को कंपनी से बाहर क्या निकाला, चारों ओर एक शब्द प्रचलित हो गया ‘मूनलाइटिंग’ (Moonlighting)। कोई इसके समर्थन में है तो कोई विरोध में।

आखिर क्या बला है ‘मूनलाइटिंग

देखिए, इसका सीधा सा अर्थ है साइड जॉब अर्थात एक कंपनी में कार्यरत होते हुए भी अन्य किसी संस्था के साथ सशुल्क कार्य करना। अब इसमें फ्रीलांस या आर्थिक लाभ के लिए किए गए कार्य शामिल होंगे। बीते वर्षों में देश में इसके मामले खुल कर सामने आ रहे हैं। अब यहाँ सवाल यह है कि हाल के दिनों में यह इतना चर्चित क्यों हो गया कि टीसीएस से लेकर इंफोसिस और सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री को भी इस पर अपनी राय रखनी पड़ी। 

दरअसल, कुछ दिनों पहले आईटी कंपनी विप्रो ने मूनलाइटिंग के आरोप में अपने 300 कर्मचारियों को कंपनी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। कंपनी का कहना था कि ये कर्मचारी संस्था के साथ धोखा कर रहे थे। इसके बाद से ही टीसीएस, आईबीएम और इंफोसिस के प्रबंधन द्वारा इस पर प्रतिक्रिया सामने आई है।

इंफोसिस ने तो अपने कर्मचारियों को मूनलाइटिंग के खिलाफ बाकायदा ई-मेल के जरिए चेतावनी जारी की है। वहीं, स्टार्ट-अप कंपनियां भी इसमें पीछे नहीं है। फूड डिलीवरी करने वाली कंपनी स्विगी ने भी अपनी ‘इंडस्ट्री फर्स्ट’ की पॉलिसी जारी की है।

इंफोसिस के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर (COO) एन गणपति सुब्रमण्य ने तो यहाँ तक कहा है कि यह इतना अनैतिक है कि इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। इससे पूरी की पूरी इंडस्ट्री चौपट हो सकती है। 

यह सही है या गलत इस पर ट्वीटर या सोशल मीडिया के बुद्धिजीवियों की अलग-अलग राय हो सकती है। हम बस इतना कह सकते हैं कि तकनीकी रूप से यह गलत तो है और अगर सही है तो इसे करने का तरीका और पारदर्शी होना चाहिए। हालाँकि, यहाँ सवाल यह उठता है कि क्या यह आज से ही हो रहा है? पहले इसके मामले सामने नहीं आए क्या? ऐसा तो नहीं हो सकता कि सिर्फ विप्रो के 300 कर्मठ कर्मचारियों को ही साइड जॉब करने का चमत्कारिक आइडिया आया हो।

जाहिर है, देश में पहले इसकी चर्चा नहीं हुई क्योंकि, पहले ऐसे मामले बड़ी संख्या में सामने आए भी नहीं। वहीं, अमेरिका जैसे विकसित देशों में मूनलाइटिंग ना सिर्फ स्वीकार्य है बल्कि कहीं ना कहीं सर्वाइवल के लिए जरूरी भी है। अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम में टैक्स के कारणों से भी ‘दोहरा रोजगार’ यानी मूनलाइटिंग वैध भी है और किया भी जाता है। हालाँकि, भारत में कारखाना अधिनियम, 1948 के अंतर्गत दोहरा रोजगार निषिद्ध है। 

देश में कोरोना काल के दौरान साइड-गिग या फ्रीलांस वर्क की संस्कृति ज्यादा फलित हुई है। वर्क फ्रॉम होम यानी घर से काम कर रहे कर्मचारियों को खुल के मौका मिला है कि वो जहाँ नियमित कर्मचारी हैं उसके अलावा भी अपनी काम के जरिए कमा सके। एक रिपोर्ट के अनुसार, कोरोनाकाल में घर से काम कर रहे 70% कर्मचारी बिना अपने नियोक्ता को बताए दूसरी जॉब पर काम कर रहे थे। 

कंपनियों का कहना है कि जब कर्मचारी बाहर काम करता है तो ना सिर्फ कंपनी के उत्पादन पर उसका असर होता है बल्कि वो उनके ही प्रतिद्वंदियों को फायदा पहुँचा रहे होते हैं। वहीं, कर्मचारियों की इस पर राय है कि जब कंपनियों के सीईओ अलग-अलग संस्थानों के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स में शामिल होते हैं तो क्या वह ‘मूनलाइटिंग’ नहीं है? 

एक तर्क यहाँ यह भी सामने आता है कि बड़े शहरों में रहते हुए जीवनयापन के लिए कम वेतन पा रहे कर्मचारी जॉब के बाद दूसरे विकल्प के जरिए कमाई करते हैं। इस तर्क की कमी यह है कि मूनलाइटिंग के सबसे ज्यादा मामले कोरोनाकाल के दौरान आए जब कर्मचारी किसी बड़े शहर में नहीं अपने घर में बैठकर काम कर रहे थे।  

‘मूनलाइटिंग’ संस्था के साथ धोखा क्यों है? जबकि कर्मचारी अपने हिस्से का काम करने के बाद ही दूसरी संस्था में सेवाएं दे रहा है। देश में इसके मामले क्यों बढ़ रहे हैं? 

एक संस्था में 9-10 घंटे देने के बाद भी अगर कोई बाहर काम कर रहा है तो उसके दो ही कारण हो सकते हैं – या तो कर्मचारी गलत जगह पर है। उसे वह काम नहीं मिल पा रहा है जिसकी उसे चाह है और उसे ही वह बाहर ढूँढ रहा है या फिर यह शौकिया है। यानी, सिर्फ ऊपरी कमाई के लिए वर्तमान संस्था के साथ धोखा

अगर कोई गलत जगह है तो उसे ‘मूनलाइटिंग’ की जगह अपने लिए उस संस्था का चुनाव करना चाहिए जो उसकी रुचि के अनुरूप हो। सोशल मीडिया पर आजकल दो चीजों का चलन देखा जा रहा है, वह हैं- ट्रैवलिंग और इस से भी ज्यादा 9-5 जॉब से बाहर निकलकर समय पूर्व सेवानिवृति का। 

मिलेनियल या जेन-जेड (जेन-ज़ी) पीढ़ी के लिए ‘योलो’ यानी ‘यू ओनली लिव वन्स’ जीवन मंत्र की तरह काम करता है और इस सूची में सैर-सपाटा सबसे ऊपर आता है। इसे स्पॉन्सर करने के लिए वे साइड-जॉब, यानी मूनलाइटिंग का सहारा लेते हैं।

दूसरा, युवा वर्ग के बीच 9 से 5 की जॉब यानी फुल टाइम वर्क या कॉरपोरेट जॉब को लेकर ऐसी धारणा विकसित है कि वह इसे जीवनयापन का साधन मानने के बजाए जीवन जीने में बंधन ज्यादा मानते हैं। 

कॉरपोरेट जॉब युवा वर्ग के बीच नकारात्मक शब्द है, जिससे वह जल्द से जल्द बाहर निकलना चाहता है और यहीं मूनलाइटिंग का सिद्धांत सामने आता है। युवा वर्ग चाहता है कि अपने शौक के जरिए वह पार्ट-टाइम जॉब तो करे ही, साथ ही धीरे-धीरे फुल-टाइम जॉब की जगह उसे प्रतिस्थापित भी कर दे।

यही संस्कृति व्यावसायिक संस्थाओं को नुकसान पहुँचा रही है। युवा वर्ग भले ही, कॉरपोरेट जॉब को उनकी स्वतंत्रता में बाधा माने लेकिन, सच तो यही है कि यह निजी संस्थान देश के 31 मिलियन से ज्यादा लोगों को रोजगार उपलब्ध करवा रहे हैं।

व्यावसायिक क्षेत्र में कम वेतन एक वजह बनती है कर्मचारियों द्वारा कार्यस्थल बदलने की लेकिन, मूनलाइटिंग के लिए यह कोई  कारण नहीं है। देश में सुप्रशिक्षित कार्यबल की कमी है। शायद यही बड़ा कारण है कि अंडर-पेड (अपनी योग्यता से कम वेतन पाना) होने पर कर्मचारी वर्ग प्रशिक्षण लेकर बेहतर पद पर जाने की बजाए समान कौशल के जरिए दो-तीन जगह से थोड़ा-थोड़ा कमाकर जीवनयापन करना ज्यादा आसान समझ रहा है। 

हाल ही के परिप्रेक्ष्य में देखें तो टीसीएस जैसी कंपनी अपने कर्मचारियों के लिए गिग-आधारित प्लेटफॉर्म विकसित कर रही हैं। अगर ऐसे कार्यक्रमों को देखें जहां संस्थान द्वारा कदम आगे बढ़ाया जा रहा है तो क्या कर्मचारियों से ईमानदारी की उम्मीद करना उचित नहीं? 

मूनलाइटिंग व्यावसायिक संस्थानों को तो नुकसान पहुँचा ही रहा है, साथ ही साथ यह देश के उस वर्ग के साथ भी धोखा है, जिन्हें इस लिए कमाई का साधन नहीं मिल पा रहा क्योंकि किसी कार्यरत व्यक्ति ने उसके हिस्से का काम भी कर दिया है। देश में जहाँ बेरोजगारी दर 6% से ऊपर है, वहाँ मूनलाइटिंग को कहाँ तक जायज ठहराया जा सकता है? 

Pratibha Sharma
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