फ़रवरी 8, 2023 2:33 पूर्वाह्न

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बिहार में माँ का एक ऐसा मंदिर, जहाँ दी जाती है सात्विक बलि

इस मंदिर में बलि की सबसे विलक्षण रीति है। यहां सात्विक तरीके से बलि दी जाती है।

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माँ मुंडेश्वरी का मंदिर बिहार के कैमूर जिले में हैं। यहीं 610 फीट ऊंची एक पहाड़ी है, जिसका नाम पवरा है। उसी पर माँ विराजमान है। यह बिहार के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। कहा जाता है कि यह लगभग 1900 साल पुराना मंदिर है। 

इसकी प्राचीनता का दावा वैसे ही नहीं किया जाता है। इस मंदिर के प्रांगण में आपको अनेक शिलालेख मिलेंगे। यहाँ प्रसिद्ध इतिहासकार फ्रांसिस बुकनन भी यहाँ आए थे। ये शिलालेख आपको बताते हैं कि यहाँ लगातार 1900 वर्षों से पूजा होती आ रही है। 

मंदिर की प्राचीनता का आभास इससे भी होता है कि यहाँ बौद्ध शासक दुत्तगामिनी की मुद्रा मिली है। वह अनुराधापुर वंश का था और ईसा पूर्व 101-77 में श्रीलंका का शासक रहा था। इस मंदिर में जो नक्काशी और मूर्तियाँ हैं, वह गुप्तकाल के बाद की हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक यह मंदिर  महाराज उदय सेन के समय बना था। वह शक संवत 30 यानी 108 ईस्वी के समय शासन करते थे। 

रोचक तथ्य:

  • यहां बकरे की बलि नहीं दी जाती, बल्कि बकरे को देवी के सामने लाकर अक्षत छिड़कते हैं। वह इससे बेहोश हो जाता है। अक्षत दोबारा छिड़कते ही वह उठकर भाग जाता है। 
  • वर्षों बाद मुंडेश्वरी मंदिर में ‘तांडुलम् भोग’ यानी चावल का भोग का वितरण शुरू हुआ। मानते हैं कि यह 108 ईस्वी की परंपरा थी। 
  • मंदिर में पंचमुखी अद्भुत शिवलिंग है, जो दिन भर में तीन रंग बदलता है।  
  • जानकार बताते हैं कि यूपी के कुशीनगर और नेपाल के कपिलवस्तु का मार्ग भी इस मंदिर से जुड़ा था। 
  • मंदिर का अष्टाकार गर्भगृह इसके निर्माण काल से अब तक कायम है। 

इस मंदिर में बलि की सबसे विलक्षण रीति है। यहां सात्विक तरीके से बलि दी जाती है। जब बकरे को माता की मूर्ति के सामने लाते हैं, तो पुजारी अक्षत यानी चावल के दाने को मूर्ति से सटाकर बकरे पर फेंकते हैं। इससे बकरा अचेत हो जाता है। थोड़ी देर बाद अक्षत फेंकने की प्रक्रिया फिर होती है और फिर बकरा उठ खड़ा होता है। उसके बाद ही उसे मुक्त कर दिया जाता है। 

इस मंदिर को लेकर अनेक कहानियां प्रचलित हैं। एक कहानी यह है कि जब चण्ड और मुंड नाम के दो राक्षस, लोगों के बीच बेहद उत्पात मचा रहे थे, तब मां ‘मुंडेश्वरी’ को प्रकट होना पड़ा।

कहा जाता है कि माता ने चण्ड नाम के राक्षस का वध कर दिया, लेकिन मुंड नाम का राक्षस पहाड़ी पर आकर छुप गया। उसी को ढूंढते-ढूंढते माता इस पहाड़ी पर आई। यहीं आकर उन्होंने मुंड नाम के राक्षस का वध किया। इसीलिए, इस मंदिर को ‘मुंडेश्वरी माता मंदिर’ भी कहा जाता है।

माता के दर्शन के लिए आपको सबसे पहले बिहार के कैमूर जिले में पहुंचना होगा। अगर आप रेल मार्ग से आ रहे हैं तो मुंडेश्वरी कैमूर जिले से सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन भभुआ है। यहां से मंदिर की दूरी 25 किलोमीटर के आसपास है। आप हवाई मार्ग से आना चाहते हैं तो नजदीकी एयरपोर्ट वाराणसी है। यहां से 80 किलोमीटर की दूरी रोड के द्वारा तय कर आसानी से पहुंच सकते हैं।

इस मंदिर का नाम मुंडेश्वरी इसलिए पड़ा है क्योंकि देवी माँ ने चंड-मुंड का विनाश यहीं किया था।  

स्वामी व्यालोक
स्वामी व्यालोक

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्‌।
तत् त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥

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