फ़रवरी 2, 2023 1:24 पूर्वाह्न

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कुल्लू दशहरा में क्या है खास, नहीं जानते हैं तो जान लीजिए

कुल्लू दशहरा अनूठा इसलिए भी है क्योंकि जब पूरे भारत में दशहरा समाप्ति की ओर होता है, देशभर में रावण का पुतला जलाया जा रहा होता है, तब यहाँ दशहरा प्रारम्भ होता है।  

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कुल्लू दशहरा

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले के ढालपुर मैदान में देवी-देवताओं का महाकुम्भ अन्तरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा महोत्सव का शुभारम्भ आज यानी बुधवार (अक्टूबर 5, 2022) को भगवान रघुनाथ की दिव्य रथ यात्रा के साथ विधिवत रूप से शुरू हो गया है। 

हिमाचल की सांस्कृतिक विरासत का ध्वजवाहक ऐतिहासिक कुल्लू दशहरे के पहले दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भगवान रघुनाथ की रथ यात्रा में शामिल हुए। कुल्लू दशहरा उत्सव के इतिहास में यह पहली बार है, जब किसी प्रधानमंत्री ने इस उत्सव में भाग लिया हो।

कुल्लू दशहरे में रणसिंघा बजाते पीएम मोदी

पूरे हिमालयी क्षेत्र में देवी-देवताओं की अवधारणा प्राचीन है और खूब प्रचलित है। यहाँ विश्वास है कि देवता भूमि पर स्वामी के रूप में शासन करते हैं, और लोगों, उनकी संपत्ति की रक्षा करते हैं।

इसी कड़ी में कुल्लू दशहरा अपने स्थानीय देवी-देवताओं और सदियों पुरानी परंपराओं के लिए जाना जाता है। इन्हीं परंपराओं से निचले हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले कई समुदायों की पहचान जुड़ी हुई है। इनके जीवन और सांस्कृतिक मूल्यों का आधार कुल्लू दशहरा सैंकड़ों वर्षों से मनाया जाता रहा है। 

कोविड-19 वैश्विक महामारी के बाद यह पहली बार है, जब कुल्लू दशहरा उत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है। कोरोना महामारी के दौरान केवल प्रतीकात्मक रूप में मनाया गया था। 

आजादी के अमृत महोत्सव पर एक बार फिर कुल्लू क्षेत्र के कई देवी-देवता इस महोत्सव के भागीदार और साक्षी बन रहे हैं। कुल्लू घाटी में भगवान रघुनाथ सर्वमान्य, सर्वशक्तिशाली देवता के रूप में विद्यमान हैं। इसके अलावा कई अन्य छोटे-बड़े देवी-देवता भी हैं। दशहरा उत्सव समिति ने इस बार कुल्लू जिला के निरमंड, अनी, बंजार, सैंज, भुंतर, मनाली और कुल्लू के तकरीबन 332 देवताओं के कारदारों को दशहरा उत्सव में आने का निमंत्रण दिया है। 

राजा जगत सिंह और कुल्लू दशहरा

ऐसा माना जाता है कि कुल्लू में इस दशहरा की शुरुआत कुल्लू रियासत के राजा जगत सिंह (1637-1672) के शासन काल से हुई है। राजा जगत सिंह भगवान रघुनाथ के पहले छड़ीबरदार (सेवक) थे। 

लोक कहानियों के अनुसार, राजा जगत सिंह, जाने-अनजाने में एक ब्राह्मण की हत्या का कारक बने। इसके बाद, जगत सिंह को ब्रह्म हत्या के दोष के कारण कई तरह की परेशानियाँ झेलनी पड़ी। मसलन, चावल की जगह कीड़े दिखना और पानी की जगह खून से भरा प्याला दिखना। 

इस दोष के निवारण के लिए विद्वतजनों ने राजा को अयोध्या के एक मन्दिर से भगवान राम की मूर्ति लाने को कहा। आदेशानुसार भगवान राम की मूर्ति अयोध्या के एक मन्दिर से चुराकर लाई गई। मूर्ति की स्थापना के बाद राजा के सारे दोष समाप्त गए। मूर्ति के चमत्कार से प्रभावित होकर राजा ने अपना सम्पूर्ण राज-पाट भगवान राम के निमित कर दिया और खुद उनके छड़ीबरदार बन गए। कुल्लू में यही ‘श्री रघुनाथ जी’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। 

इस घटना के बाद से कुल्लू में सभी देवी-देवताओं ने भगवान रघुनाथ जी का समग्र आधिपत्य स्वीकार कर लिया। इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए आज भी कुल्लू जिले के कई देवी-देवता दशहरे मेले में भगवान रघुनाथ जी को प्रणाम करने और भाग लेने आते हैं। 

राजा जगत सिंह और भगवान राम के सम्बन्ध में यहाँ एक लोकोक्ति बहुत प्रचलित है। “मकड़ाह अजोध्या पुरी मानो हेमब्रज की रीत, जगत सिंह महाराजा की श्री राघोजी से प्रीत।”

खास है, रघुनाथ मन्दिर की पूजा पद्धति 

श्री रघुनाथ मन्दिर की अपनी एक अनूठी पूजा पद्धति है। यह वही पूजा पद्धति है, जो पहले अयोध्या में रामलला की पूजा के समय उपयोग होती थी। भगवान रघुनाथ के मुख्य छड़ीबरदार राजा महेश्वर सिंह बताते हैं कि इस अनूठी पूजा पद्धति की एक प्रति आज भी उनके पास है। यहाँ उसी पूजा पद्धति से पूजा की जाती है।

कुल्लू दशहरा की शुरुआत

भगवान रघुनाथ जी इस क्षेत्र के प्रमुख देवता हैं। हालाँकि, कई अन्य महत्वपूर्ण देवी-देवता भी हैं। मसलन, हिडिम्बा देवी। इस क्षेत्र में एक लोकप्रिय देवी हैं, जिन्होंने राजाओं को अपना शासन स्थापित करने और अपने राज्यों का विस्तार करने में सहायता की। हिडिम्बा देवी कितनी महत्वपूर्ण हैं, इसका आकलन इस बात से किया जा सकता है कि भगवान रघुनाथ की रथ यात्रा देवी हिडिम्बा के आगमन के बाद ही प्रारम्भ होती है।

हिमाचल प्रदेश में देवी-देवता, शासन-प्रशासन के भी ऊपर हैं। इसका अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कुल्लू दशहरे में देवी-देवता तय करते हैं कि कब यह उत्सव होना है और कैसे होना है। यह 372 सालों से चली आ रही परम्परा का प्रतीक है। आज भी जब कुल्लू दशहरा की तैयारियों के लिए भगवान रघुनाथ जी की तरफ से छड़ीबरदार के माध्यम से प्रशासन को आदेश होता है। तभी प्रशासन दशहरे की तैयारियों में जुटता है। 

कुल्लू दशहरा अनूठा इसलिए भी है क्योंकि जब पूरे भारत में दशहरा समाप्ति की ओर होता है। देशभर में रावण का पुतला जलाया जा रहा होता है, तब यहाँ दशहरा प्रारम्भ होता है।  

दशहरे के पहले दिन, देवी-देवता एक-एक करके भगवान रघुनाथ जी के मन्दिर में पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ मिलते हैं। उनकी वापसी पर, वे रघुनाथ जी के छड़ीबरदार राजा महेश्वर सिंह  और उनके परिवार के सदस्यों से मिलने के लिए रूपी पैलेस जाते हैं। 

देवता अपने गोर (जो देवता की बात शब्दों में बयाँ करता है) के माध्यम से राजा के साथ अपनी चिंताओं पर चर्चा करते हैं। राजा, देवता के क्षेत्र के बारे में, उनकी चिंताओं के बारे में सुनते हैं और भगवान रघुनाथ जी की ओर से सुझाव देते हैं।

सभी देवता भगवान रघुनाथ जी के दर्शन के बाद, मूर्ति को राजा और अन्य देवताओं के साथ ढालपुर मैदान की ओर ले जाया जाता है। ढालपुर मैदान में भगवान रघुनाथ जी का लकड़ी से बना रथ तैयार रहता है। इस रथ को रंगीन कपडों से सजाया जाता है। रथ से जुड़ी रस्सियों को भक्तजन खींचते हैं। इस रथ का नेतृत्व नाग देवता करते हैं। यह रथ यात्रा कुछ हद तक भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा जैसा मालूम पड़ता है। 

रथ को ढालुपर मैदान में बने एक अस्थायी मन्दिर तक खींचा जाता है और वहाँ सात दिनों के लिए  भगवान रघुनाथ जी की मूर्ति स्थापित की जाती है। इस सात दिवसीय मेले में सैकड़ों ग्रामीण देवी-देवता भी अपनी पालकियों के साथ मैदान में अपने अस्थायी स्थान पर रहते हैं। भक्तजन आते हैं, दर्शन करते हैं।

कुल्लू दशहरे में लोक वाद्य यंत्र

कुल्लू दशहरे में लोक वाद्य यंत्रों का बहुत महत्व है। इन वाद्य यंत्रों की धुन और ताल पर लोग तो नृत्य करते ही हैं। साथ ही, देवी-देवता भी  अलग-अलग वाद्य यंत्रों की धुन और ताल पर नृत्य करते हैं। यह वाद्य यंत्र लोगों में उत्साह भरते हैं। कभी-कभार तो नौबत यहाँ तक आ जाती है कि धुन और ताल के बीच व्यक्ति स्वयं पर से नियंत्रण खो बैठता है। वो उस धुन में मग्न हो जाता है। 

कुल्लू के लोक वाद्य यंत्रों में ढ़ोल-नगाड़ा, बाम, डफल, धाध, धोंस ध्रघ, भाना, घांती, छंछला, कांशी, धनोटू, कोन्च, करनाहल, कहाला, नागफनी, पंचमुखी कहल, रणसिंघा और शहनाई शामिल है। 

सांस्कृतिक दृष्टि से कुल्लू दशहरा

किसी भी समाज का मनोरंजन उसकी सांस्कृतिक मान्यताओं से जुड़ा होता है। कुल्लू की नाटी (नृत्य) में यहाँ की सांस्कृतिक मूल्य झलकते हैं। कुल्लू का सांस्कृतिक दशहरा देवी-देवताओं से जुड़ा उत्सव तो है ही, साथ ही, भारत की सांस्कृतिक विरासत को विश्व पटल पर रखने के साथ-साथ दुनिया की सांस्कृतिक और लोक कलाओं को भी एक मंच प्रदान करता है।

अन्तरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरे के उत्सव में हर बार की तरह देश-विदेश से कई लोक कलाकार आ रहे हैं। उत्सव के सातों दिन लोकगीतों और लोकनाट्यों का आयोजन होता है। इस बार भूटान, यूक्रेन, मलेशिया, रूस के लोक कलाकार कुल्लू महोत्सव में आए हैं। स्कैलटेन नृत्य, सैंड आर्ट, तनौरा नृत्य, मलखम्भ जैसे सांस्कृतिक नृत्य विदेशी कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किए जाएंगे।

कुल्लू दशहरे में देशज संस्कृति और परम्पराओं की झलक देखने को मिलती है। आगंतुक को कुल्लू की जीवन्त संस्कृति का अनुभव कुल्लू दशहरा के इन सात दिनों में होता है। पारंपरिक भोजन, दैवीय गतिविधि, रहन-सहन से परिचित करवाने का यह सुनहरा अवसर है। इसके अलावा, हिमाचल प्रदेश के 12 जिलों के लोक कलाकार समेत देश के अन्य राज्यों से भी कई लोगों के समूह कुल्लू दशहरा में  सांस्कृतिक प्रस्तुति देते हैं। 

आर्थिक दृष्टि से कुल्लू दशहरा

हिमाचल प्रदेश की कुल्लू घाटी पर्यटन के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। कुल्लू दशहरा पर्यटकों को आकर्षित करने का एक  सबसे बड़ा जरिया बन गया है। अंतरराष्ट्रीय मेले के परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में अन्तरराष्ट्रीय पर्यटक मेले में भाग लेने आते हैं।  इससे वाणिज्य में वृद्धि के साथ-साथ क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलता है। इसका सीधा लाभ स्थानीय लोगों को होता है।

सप्ताह भर चलने वाले इस उत्सव के दौरान हस्तनिर्मित उत्पादों को बेचने का सुनहरा अवसर होता है। खासतौर पर उन क्षेत्रों के उत्पादों को जो दूरस्थ हैं, जहाँ आवागमन आसान नहीं। इसके अलावा कुल्लू और किन्नौरी शॉल, कालीन, हिमाचली टोपी, खादी से बने कपड़े, सूखे मेवे इत्यादि आकर्षण का प्रमुख केन्द्र होते हैं।

यह उत्सव स्थानीय उत्पादों की बिक्री को बढ़ाता ही है। साथ ही, हिमाचल के पड़ोसी राज्यों से आने वाले व्यापारियों, दुकानदारों के लिए भी व्यापार का एक बड़ा अवसर प्रदान करता है। 

कुल्लू दशहरा देवी-देवताओं के संगम के साथ-साथ, देश-विदेश की  विभिन्न संस्कृतियों और उनके मूल्यों के आदान-प्रदान का एक जरिया भी है। यह अवसर है, ठहरकर,  अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करने का, इस जीवंत विरासत को पुन: जीने का।   

Jayesh Matiyal
Jayesh Matiyal

जयेश मटियाल पहाड़ से हैं, युवा हैं और पत्रकार तो हैं ही।
लोक संस्कृति, खोजी पत्रकारिता और व्यंग्य में रुचि रखते हैं।

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