फ़रवरी 4, 2023 1:42 अपराह्न

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सप्तशती में देवों ने गाई है देवी की तलवार की भी महिमा

देवी ने तलवार के द्वारा इतने असुर मारे, कि देवताओं को देवी के खड्ग यानी तलवार के प्रति भी भक्ति उत्पन्न हो गई। उन्हें यह खड्ग अपना रक्षक जान पड़ा। एकादश अध्याय में नारायणी की तरह-तरह से स्तुति करने के बाद वे देवी की तलवार की भी स्तुति करते हैं।

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देवी को उपहार में मिली थी तलवार

जब महिषासुर देवताओं को हराकर उनके अधिकार छीन लेता है तो सब देवता भगवान् विष्णु व भगवान् शिव के पास जाकर पूरी बात उन्हें बताते हैं। इससे क्रोधित होकर विष्णु, शिव व सभी देवताओं से उनकी शक्ति निकलती है और एकाकार होकर देवी का रूप धारण कर लेती हैं।

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इन देवी को देखकर सभी देवता आनंद से भर जाते हैं, फिर सभी देवता उन्हें उपहार में अलग अलग वस्तुएं देते हैं। जैसे शिव उन्हें शूल देते हैं और विष्णु चक्र, इन्द्र वज्र देते हैं और वरुण पाश। ऐसे ही काल उन्हें खड्ग यानी तलवार देते हैं।

कालश्च दत्तवान् खड्गं तस्याश्चर्म च निर्मलम्। (सप्तशती 2.24)

यह तलवार देवी के बहुत काम आई

अपनी इसी तलवार की चोट से देवी ने विडाल के सिर को धड़ से काट गिराया था।

बिडालस्यासिना कायात्पातयामास वै शिरः। (सप्तशती 3.20)

महिषासुर युद्ध में बार-बार अपने रूप बदल रहा था, कभी सिंह बनता तो कभी पुरुष। इस पुरुष को देवी ने इसी तलवार और ढाल से बींध डाला था।

तं खड्गचर्मणा सार्धं“(सप्तशती 3.31)

जब महिषासुर ने हाथी का रूप धारण किया तो देवी ने इसी तलवार से उसकी सूंड काट डाली।

कर्षतस्तु करं देवी खड्गेन निरकृन्तत॥ (सप्तशती 3.32)

अन्त में महिषासुर का वध भी इसी तलवार से हुआ। देवी ने अपनी बहुत बड़ी तलवार से उसका मस्तक काट डाला।

(सप्तशती 3.42)

देवी के खड्ग के तेज से असुरों की आँखें क्यों नहीं फूटीं ?

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देवी दुर्गा

देवता स्वयं ही यह प्रश्न पूछते हैं और स्वयं ही उसका उत्तर भी देते हैं। भगवती की स्तुति करते हुए देवता कहते हैं :-

खड्गप्रभानिकर-विस्फुरणैस्तथोग्रः
शूल ग्रकान्तिनिवहेन दृशोऽसुराणाम् ।
यन्नागताविलयमंशुमदिन्दुखण्ड
यन्नाग्याननं तव विलोक्यतां तदेतत् ॥
(सप्तशती 4.20)

वे कहते हैं, आपकी तलवार के तेजपुंज की भयंकर दीप्ति से और आपके त्रिशूल की प्रभा से चौंधियाकर असुरों की आँखें फूट नहीं गईं, तो उसका कारण यही है कि वो साथ ही साथ आपके चन्द्रमा के समान सुंदर और मनोहर मुख का भी दर्शन करते थे।

फिर देवता प्रार्थना करते हैं कि आप उस खड्ग से भी हमारी रक्षा करें।

पाहि खड्गेन चाम्बिके। (सप्तशती 4.24)

देवी कवच में कहा है कि “खड्गधारिणी” देवी नैऋत्य दिशा में रक्षा करती हैं। “नैऋत्यां खड्गधारिणी

चण्ड मुण्ड का वध भी तलवार से किया

छत्रपति शिवाजी को तलवार भेंट करती तुलजा भवानी

देवी ने इस तलवार से बड़े बड़े दैत्यों को मार डाला क्योंकि यह खड्ग स्वयं कालरूप थी, काल ने ही देवी को दी थी।

चण्ड से युद्ध के समय देवी ने बहुत बड़ी तलवार हाथ में लेकर हं बोलकर चण्ड पर धावा बोला और उसके बाल पकड़कर उसी तलवार से उसका सिर काट डाला।

चण्ड को मरा देखकर मुण्ड भी देवी की ओर दौड़ा, तब क्रोधित देवी ने इसी तलवार से उसे भी जमीन पर सुला दिया।

उत्थाय च महासिं हं देवी चण्डमधावत।
गृहीत्वा चास्य केशेषु शिरस्तेनासिनाच्छिनत्॥
अथ मुण्डोऽभ्यधावत्तां दृष्ट्वा चण्डं निपातितम्।
तमप्यपातयद्भूमौ सा खड्गाभिहतं रुषा॥

(सप्तशती 7.20-21)

निशुम्भ को भी तलवार से मारा

शुम्भ के घायल हो जाने पर निशुम्भ देवी को मारने गदा लेकर दौड़ा, पर देवी ने तुरन्त अपनी तीखी धार वाली तलवार से उसकी गदा को काट डाला। युद्ध के बीच निशुम्भ देवी को धमकी देता हुआ “खड़ी रह खड़ी रह” चिल्लाया, पर देवी उसकी इस बात पर ठठाकर हँस पड़ी और तलवार से उसका सिर काट डाला।

खड्गेन शितधारेण स च शूलं समाददे॥
(सप्तशती 9.33)
शिरश्चिच्छेद खड्गेन ततोsसावपतद्भुवि।
(सप्तशती 9.36)

देवता करते हैं भगवती की तलवार से प्रार्थना

देवी ने तलवार के द्वारा इतने असुर मारे, कि देवताओं को देवी की खड्ग यानी तलवार के प्रति भी भक्ति उत्पन्न हो गई। उन्हें यह खड्ग अपना रक्षक जान पड़ा। एकादश अध्याय में नारायणी की तरह तरह से स्तुति करने के बाद वे देवी की तलवार की भी बड़ी सुंदर स्तुति करते हैं। देवता कहते हैं :-

देवी का खड्ग, चित्र साभार – हैली गोस्वामी

असुरासृग्वसापङ्कचर्चितस्ते करोज्ज्वलः ।
शुभाय खड्गो भवतु चण्डिके त्वां नता वयम् ॥

(सप्तशती 11.28)

अर्थात्, हे भगवती! असुरों के रक्त एवं माँस से निर्मित कीचड़ से सना हुआ यह खड्ग तुम्हारे हाथों में सुशोभित हो रहा है। तुम्हारे शुभ्र हस्तों से निःसृत प्रकाश इस रक्तमेद के पंक से सने हुए खड्ग को प्रकाशित कर रहा है। ऐसा यह वर्चस्वी खड्ग हमारा कल्याण करे। हे चण्डिके हम सब तुम्हारे चरणों में पड़े हुए हैं।

अहा! देवताओं की यह स्तुति राष्ट्र के शत्रुओं पर मारण प्रयोग बने! देवी का खड्ग राष्ट्र की रक्षा करे।

देवी की पूजा में बलि का बड़ा महत्त्व है। बिना बलि के देवी कैसे भी प्रसन्न नहीं होती। सप्तशती में भगवती स्वयं कहती हैं :-

बलिप्रदाने पूजायामग्निकार्ये महोत्सवे।
सर्व ममैतच्चरितमुच्चार्यं श्राव्यमेव च ॥
जानताऽजानता वापि बलिपूजां तथा कृताम्।
प्रतीच्छिष्याम्यहं प्रीत्या वहिनहोमं तथा कृतम्॥
(सप्तशती 12.10-11)

बलिदान, पूजा, होम तथा महोत्सव के अवसरों पर सप्तशती का पूरा पाठ और श्रवण करना चाहिये। जो मनुष्य विधि को जानकर या बिना जाने भी मेरे लिये जो बलि, पूजा या होम आदि करेगा, उसे मैं बड़ी प्रसन्नता के साथ ग्रहण करूँगी।

बिहार में माँ का एक ऐसा मंदिर, जहाँ दी जाती है सात्विक बलि

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सिंहवाहिनी खड्गधारिणी देवी

बलि केवल मांस की ही नहीं होती, शाक्त आगम में जायफल, कूष्माण्ड आदि की सात्त्विक बलि भी बताई गई है। संकल्प लेकर अपना बल देवी को समर्पित कर देना भी बलि है। बलि के खड्ग के लिए भी एक प्रार्थना जी जाती है :–

खड्ग प्रार्थना

ॐ असिर्विशसनः खङ्गः तीक्ष्णधारो दुरासदः।
श्रीगर्भो विजयश्चैव धर्मपाल नमोsस्तुते॥१॥
इत्यष्टौ तव नामानि स्वयमुक्तानि वेधसा।
नक्षत्रं कृत्तिका ते तु गुरुर्देवो महेश्वरः॥२॥
रोहिण्यश्च शरीरं ते धाता देवो जनार्दनः।
पिता पितामहो देवः त्वं मां पालय सर्वदा॥३॥
नीलजीमूतसंकाशः तीक्ष्णदंष्ट्रः कृशोदरः।
भावशुद्धोsमर्षणश्च अतितेजाः तथैव च॥४॥
इयं येन धृता क्षोणी हतश्च महिषासुरः ।
तीक्ष्णधाराय शुद्धाय तस्मै खङ्गाय ते नमः ॥५॥

अर्थात्, असि, विशसन, खंग, तीक्ष्णधार(तीखी धार वाला), दुरासद (जिसे पार करना मुश्किल है), श्रीगर्भ, विजय और धर्मपाल को नमस्कार है।१।

हे तलवार! आपके ये 8 नाम स्वयं पितामह ब्रह्मा ने बताए हैं। कृतिका आपका नक्षत्र है,  और भगवान् महेश्वर आपके गुरु हैं।२।

आपका शरीर रोहिण्य यानि शत्रुओं के रक्त से सना हुआ होने के कारण लाल वर्ण वाला है, भगवान् विष्णु आपके पालक हैं,  पितामह देव ब्रह्मा आपके पिता हैं। हे खड्ग! आप हमेशा मेरी रक्षा करें।३।

आप नीले बादलों की तरह गरजने वाले हैं, आपके दाँत नुकीले हैं और आप पतले पेट वाले हैं। आप शुद्ध भाववाले, असहनशील हैं और अतितेजस्वी हैं।४।

जिसने इस धरणी को धारण किया है, जिसने महिषासुर का वध किया है उस तीक्ष्ण धार वाले और शुद्ध स्वरूप वाले खड्ग! आपको मेरा प्रणाम है।५।

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Mudit Agrawal
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