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भगिनी निवेदिता: स्वामी विवेकानंद की एक डाँट ने बदल दिया था भारत के प्रति दृष्टिकोण

हिंदुत्व और भारतीय संस्कृति की प्रचारक और भारतीय मूल्यों पर चलने वाली भगिनी निवेदिता ने 13 अक्टूबर, 1911 के दिन दार्जिलिंग में अंतिम सांस ली थी।

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स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता, हिंदुत्व के मूल्यों पर गुजारा जीवन

“मुझे स्पष्ट बताने का कष्ट करें कि मेरा जीवन क्या भारत के किसी उपयोग में आ सकता है? मेरी इच्छा है कि भारत मुझे जीवन की पूर्णता की शिक्षा प्रदान करे”।

यह बात मार्गरेट एलिजाबेथ नोबेल ने स्वामी विवेकानंद को पत्र लिखकर कही थी। 1895 में जब स्वामी विवेकानंद लंदन में प्रवास पर थे तब मार्गरेट एलिजाबेथ नोबेल की मुलाकात उनसे हुई और यहीं से वह उनके साथ भारत आना चाहती। यह बात और थी कि स्वामी विवेकानंद ने इसे लेकर उन्हें उत्साहित नहीं किया।

मार्गरेट एलिजाबेथ नोबेल, आयरलैंड में पली बढ़ी एक महिला, जिन्होंने भारतीय समाज और वेदांत की शिक्षा पर चलते हुए शैक्षणिक उत्थान की दिशा में काम किया था। भगिनी निवेदिता ने आज ही के दिन, यानी 13 अक्टूबर, 1911 को दार्जिलिंग में आखिरी सांस ली थी। 

शिकागो में दिए अपने ऐतिहासिक भाषण के बाद 1985 में स्वामी विवेकानंद 3 माह के लंदन प्रवास पर थे। इस दौरान एक मित्र के घर पर मार्गरेट की भेंट स्वामी विवेकानंद से हुई, जो वहाँ वेदांत दर्शन की व्याख्या कर रहे थे।

यहीं से मार्गरेट एलिजाबेथ वेदांत दर्शन और स्वामी विवेकानंद के ज्ञान के प्रति आकर्षित हुईं और उनके व्याख्यानों में जाना शुरू किया। उनके मन में उठे ढेरों प्रश्नों के उत्तर उन्होंने स्वामी विवेकानंद से प्राप्त किए। ऐसा लग रहा था, वर्षों की उनकी खोज समाप्त हो गई थी और यहीं से उन्होंने महात्मा बुद्ध और स्वामी विवेकानंद के सिद्धांतों पर चलने का निर्णय लिया था। मार्गरेट लगातार स्वामी विवेकानंद को पत्र लिखते रहीं और 28 फरवरी, 1898 को उन्होंने कलकत्ता में पहला कदम रखा।

25 मार्च, 1898 मार्गरेट नोबेल के जीवन का ऐतिहासिक दिन रहा जब वे स्वामी जी के कहने पर पूजा गृह में गई और भगवान शिव की पूजा-अर्चना की। यहीं पर स्वामी विवेकानंद ने उनके ललाट पर भस्म का टीका लगाकर दीक्षा के उपरांत उन्हें अपनी शिष्या स्वीकार किया और निवेदिता नाम भी दिया।

स्वामी विवेकानंद ने उनका परिचय भारतीय संस्कृति, दर्शन, लोक, साहित्य और इतिहास से कराया। यह समय भगिनी निवेदिता के लिए परिवीक्षा की अवधि थी। इस दौरान, भगिनी निवेदिता की एक मित्र ने स्वामी जी से कहा कि ‘ये आपने निवेदिता के साथ क्या किया’?  

इस पर उन्होंने शांतिपूर्वक उत्तर दिया, “उस पर दया मत करो! अब वो भारत को समर्पित हैं, इससे भी महत्वपूर्ण है कि उसे बिगाड़ो मत, मैंने अपने शिष्यों में सबसे ज्यादा समय निवेदिता को दिया है।”

भारतीयों से जुड़ाव और उनके प्रति समर्पण भाव उत्पन्न हो इसके लिए आवश्यक था भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता के साथ जुड़ाव। भगिनी निवेदिता के लिए यह इतना सहज भी नहीं रहा और इस यात्रा में उनको स्वामी विवेकानंद की नाराजगी का सामना भी करना पड़ा था।

निवेदिता के मुख से एक बार पराए भाव से किसी बात पर ‘ये भारतीय’ का संबोधन हुआ तो स्वामी विवेकानंद ने उनसे कहा, “अगर तुम भारत को अपना नहीं मानती तो अपने ब्रिटिश अभिमान के साथ वापस जा सकती हो”

भारत में सेवा भाव के लिए आई निवेदिता के मन को इस बात से ठेस पहुँची तो पत्रों के जरिए उन्होंने अपनी बात स्वामी जी तक पहुँचाई और इसके बाद भारतीयों के लिए कभी पराए शब्दों का प्रयोग उन्होंने नहीं किया।

यह इतना बड़ा बदलाव था कि भगिनी निवेदिता ने फिर कभी भारत को अंग्रेजी के ‘It’ से नहीं बल्कि ‘Her’ से संबोधित करती थीं। उन्होंने हिंदुत्व को इसके बाद अपने साथ आत्मसात कर लिया था। इसे ही देखकर रविंद्र नाथ टैगोर ने कहा था कि ‘इस भूमि पर जन्म लिए किसी भी हिंदू से निवेदिता अधिक हिंदू थी’।

भारत के साथ जुड़ने, यहाँ के लोगों को समझने, दर्शन-विचार के प्रसार के लिए निवेदिता ने स्वामी विवेकानंद, कुमारी जोसेफिन मैक्लिऑड और सारा बुल के साथ कश्मीर सहित भारत के कई हिस्सों का भ्रमण किया था।

मई, 1898 में निवेदिता हिमालय भ्रमण को गई थी। इसके बाद वो अल्मोड़ा भी गई, जहाँ उन्होंने स्वामी विवेकानंद से ध्यान की कला को आत्मसात किया। स्वामी जी ने इस दौरान उनके अंदर अहंकार, द्वेष की भावनाओं को दूर करने का कार्य किया। इसके बाद वे अमरनाथ और फिर अपने गुरु के साथ अमेरिका भी गई। 

निवेदिता को ज्ञान मिलने के बाद लोगों की सेवा की दृष्टि भी मिल गई। कलकत्ता में फैली प्लेग महामारी के दौरान वो बाग बाजार की गलियों में फावड़ा लेकर सफाई कर रही थीं, तभी बालिका शिक्षा के उत्थान के  लिए उत्तरी कलकत्ता में  उन्होंने एक स्कूल की स्थापना भी की।

स्वामी विवेकानंद का  कहना था कि ‘महिलाओं का उत्थान तथा जनमानस की जागृति पहले होनी चाहिए तभी देश का भला होगा’। भगिनी निवेदिता ने बेलुड़ मठ पहुँचकर नारी शिक्षा का कार्य अपने हाथों में लिया। भारतीय महिलाओं के प्रति उनकी राय विकासवादी रही। उनका मानना था कि भारतीय स्त्रियों की चारित्रिक दृढ़ता, सामाजिक और मानसिक स्थिति पश्चिमी महिलाओं की तुलना में बेहतर स्थिति में है।

भगिनी निवेदिता भारत की स्वतंत्रता की पक्षधर रही और अरविंद घोष के साथ भी उन्होंने काम किया था। डॉ जगदीश चंद्र बसु पर लंदन में हो रहे अत्याचारों का उन्होंने खुलकर विरोध भी किया। 

भारत की ‘लोकमाता’ नाम से प्रसिद्ध हुई भगिनी निवेदिता ने हिन्दू जीवन पद्धति का अध्ययन भी किया और इसके प्रसार के लिए पुस्तकें भी लिखीं। उन्होंने अपने विचारों को हिंदुत्व की पालना की कथाएं (Cradle tales of Hinduism), भारतीय जीवन जाल (Web of Indian life), पथ और पाथेय (Religion and Dharma) और आक्रामक हिंदुत्व (Aggressive Hinduism) पुस्तकों के जरिए प्रदर्शित किया है। 

भारतीय  संस्कृति से जुड़ाव और हिंदुत्व के प्रचार प्रसार के साथ भगिनी निवेदिता ने 13 अक्टूबर, 1911 को  दार्जिलिंग में आखिरी सांसें लीं। दार्जिलिंग रेलवे स्टेशन के नीचे उनका स्मारक बना हुआ है, जिसके नीचे लिखा है-

‘यहां चिर शांति में लीन हैं भगिनी निवेदिता, जिन्होंने भारत के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।’

Pratibha Sharma
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