फ़रवरी 2, 2023 1:08 पूर्वाह्न

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तनोट माता मंदिरः बाल भी बाँका नहीं कर पाए थे पाकिस्तान के बम

राजस्थान के जैसलमेर से 120 किमी दूर बॉर्डर के नजदीक मातेश्वरी तनोट राय का मंदिर है, जिससे पाकिस्तानी सेना आज भी थर-थर काँपती है।

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तनोट माता मंदिरः मंदिर का बाल भी बाँका नहीं कर पाए थे पाकिस्तान के बम

1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच भीषण युद्ध जारी था। राजस्थान के जैसलमेर बॉर्डर के करीब एक मंदिर को लक्षित कर के हथियार चलाए जा रहे थे। मंदिर परिसर के आस-पास भी बमों की वर्षा हो रही थी। हालाँकि, दुश्मन सेना के उस वक्त होश उड़ गए, जब मंदिर परिसर के आस-पास फेंके गए बम निष्क्रिय हो गए।  

हम बात कर रहे हैं युद्धों वाली माता के नाम से प्रसिद्ध और शक्तिपीठ हिंगलाज माता के अन्य रूप मातेश्वरी तनोट राय या तनोट राय माता मंदिर का। इन्हें चरन की देवी के रूप में भी जाना जाता है। 

तनोट माता का नाम आपने वर्ष 1997 में आई फिल्म बॉर्डर में सुना होगा, जिसमें इनके चमत्कारों को दिखाया गया है। इसे किम्वदंती मानें या सच्चाई लेकिन, यह तो वास्तविकता है कि 1965 के भीषण युद्ध के  बाद भी माता के मंदिर पर खरोंच तक नहीं आई थी। 

क्या है मंदिर का इतिहास 

बलूचिस्तान के लास्वेला जिले में स्थित शक्तिपीठ दैवीय देवी हिंगलाज माता का दूसरा रूप ही तनोट राय माता है। तनोट देवी को 847 ईस्वी में मंदिर में स्थापित किया गया था। भाटी राजपूत समुदाय द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी इस मंदिर की देखभाल की गई।

प्राचीन कथा कुछ इस प्रकार है कि माड़ प्रदेश (जैसलमेर) में चेलक निवासी मामड़िया चारण का विवाह मावड़ निवासी मोहवती बाई से हुआ। मामड़िया सा के परिवार में धन्य-धान की किसी प्रकार से कमी नहीं थी। विवाह के पश्चात लंबे समय तक संतान का सुख नहीं मिला था। 

मामड़िया और उनकी मारू (पत्नी) बलूचिस्तान स्थित  हिंगलाज माता के परम भक्त थे। वह हर वर्ष माता के यहां एक बार पैदल ही जरूर जाते थे। बाद में, संतान प्राप्ति के लिए दोनों पति-पत्नी ने हिंगलाज निजधाम की 7 बार यात्रा की थी। 

मामड़िया जब 7वीं बार यात्रा करने गए तो मंदिर चौगान में ही सो गए। उसी आधी रात देवी ने उनको अपने दिव्य रूप के दर्शन देकर वरदान माँगने का आदेश दिया, 

“हे  म्हारा भगत मामड़! माँग चारण माँग, वरदान माँग, जो माँगे सो दूँ”

मतलब कि हे मेरे भक्त मामड़, माँगो चारण माँगो..वरदान माँगो, जो माँगोगे वो दूँगी। 

इस पर चारण ने माता से कहा, 

“हे माँ

दास माथे जै

महर करो तो

आप म्हारे 

आँगणे पधारो” 

मतलब, हे माँ, अगर आपके दास पर उपकार करना ही है तो आप मेरे आंगन में जन्म लो।

इसके बाद माता ने तथास्तु बोल कर ना सिर्फ भक्त मामड़ की इच्छा पूरी की बल्कि उन्हें वरदान दिया कि जैसे आपने 7 बार मेरी यात्रा की है, उससे आपके घर 7 बेटियों और एक बेटे का जन्म होगा। 

मामड़ आशीर्वाद पाकर धन्य हो गए और माता हिंगलाज की मूर्ति को दंडवत प्रणाम कर अपने निवास स्थान चेलक लौट आए। इसके बाद विक्रम संवत 808, चैत्र सुदी नवमी नवरात्रा को मामड़ और मोहवती बाई के घर ओजस्वी कन्या का जन्म हुआ। 

कथा के अनुसार, कन्या के जन्म के समय भयंकर तूफान आया। बारिश से हर स्थान जलमग्न हो गया, तेज हवाएँ चलने लगी। मामड़ ने माता हिंगलाज को साष्टांग प्रणाम कर कन्या का नाम आवड़ रखा।  

आवड़ के बाद मामड़ के घर 7 कन्याओं का जन्म हुआ, जिनमें आसी, छैछी, हुलबाई, गुलबाई, रुपलबाई, लांगबाई थी और मेहरखो नामक पुत्र भी हुआ। आवड़ और उनकी बहनें बालपन से ही अपने चमत्कारिक गुणों के लिए क्षेत्र में जाने जानी लगी थी। 

विक्रम संवत 862 में भाटी राजा केहर तणुराव और उनकी पत्नी महारानी सारगंदे सोलंकियाणी हिंगलाज माता के परम भक्त थे। माता के आशीर्वाद से राजा के घर विजयराव नाम के पुत्र का जन्म हुआ। राजा तणुराव ने आवड़ माता के प्रसंग सुनने के बाद अपनी पत्नी और पुत्र संग उनके दर्शन किए और उनको अपने गढ़ तनोट पधारने का निमंत्रण दिया।

अपने भक्त की इच्छा पूरी करने हेतु आवड़ माता ने तनोट गढ़ की यात्रा की। विक्रम संवत 888 में राजा तणुदेव ने अपने हाथों से तनोट किले में तनोट के मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा रखी। इसी दिन से माँ आवड़ तनोट माता के नाम से जानी गई। 

तनोट माता के चमत्कार

तनोट माता चमत्कारी हैं, इसके कई किस्से प्रसिद्ध है। एक बार तणुराव से अपनी हार का बदला लेने के लिए बठिंडा के राजा ने तनोट गढ़ पर हमला कर दिया। उस समय राजा विजयराव थे, जिनको दुश्मन की सेना को हराने के लिए माता ने एक चुड़ दी, जिससे एक साथ हजार तलवारें चल सकती थी। इस चुड़ की वजह  से उनका नाम चुड़ालो विजेराव पड़ गया।  

माता के ऐसे ही कई प्रसंग रेतीले प्रदेश (राजस्थान) के निवासियों के दिलों में बसे हुए हैं। बात वर्ष 1965 की हो या वर्ष 1971 की जब पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया था, माँ तनोट ने हमेशा अपना चमत्कार दिखाया है। 

वर्ष 1965, में पाकिस्तान ने तनोट माता मंदिर पर करीब 3 हजार बम बरसाए थे। वहीं 450 गोले तो मंदिर परिसर के अंदर ही गिरे थे लेकिन, मंदिर वैसे का वैसा ही रहा। वर्ष 1971 में भी भारतीय सेना ने पाकिस्तान के टैंकों और बमों को धूल चटा दी थी। दो युद्धों की विभीषिका झेल चुका यह मंदिर अपनी जगह पर पूरी शान के साथ खड़ा हुआ है। 

दोनों युद्धों में माता का चमत्कार देखकर 1965 के बाद से ही यहाँ सेना की चौकी स्थापित की गई और सीमा सुरक्षा बल (BSF) ही यहाँ की देखभाल करता है। फिलहाल, मंदिर के संचालन का संपूर्ण कार्य बीएसएफ ट्रस्ट द्वारा किया जाता है। 

साथ ही, भारत-पाक युद्ध, 1965 के दौरान मंदिर परिसर में गिरे बमों को श्रद्धालु आज भी देख सकते हैं। भारतीय सेना ने मंदिर में बमों को संग्रहालय  भी बना रखा है, जिसमें पाक सेना द्वारा फेंके गए बम रखे हैं। 

भारत-पाक युद्ध, 1971 के दौरान हुए प्रसिद्ध लोंगेवाला का युद्ध के बारे में तो आपने सुना ही होगा। उस वक्त 4 दिसबंर की रात पाकिस्तान ने रात को सोते हुए भारतीय जवानों पर हमला कर दिया था। लोंगेवाला में पंजाब रेजीमेंट की 23वीं बटालियन मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी के नेतृत्व में तैनात खड़ी थी, जिसमें मात्र 120 जवान शामिल थे। 

हालाँकि, इस छोटी सी बटालियन ने दुश्मन के इरादों को मिट्टी कर दिया। यह लोंगेवाला भी तनोट माता मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित है। लोंगेवाला में जीत मिलने पर मंदिर परिसर में विजय स्तंभ का निर्माण करवाया गया था। यहाँ हर वर्ष 16 दिसंबर को  भारतीय सेना द्वारा जीत की खुशी और युद्ध में शहीद जवानों के सम्मान के लिए उत्सव मनाया जाता है। 

यहाँ पर यह प्रसंग भी सामने आता है कि माता के चमत्कार से पाकिस्तान सेना डर के भाग खड़ी हुई। हालाँकि, पाकिस्तानी सेना के ब्रिगेडियर शाहनवाज खान ने भारत सरकार से माता के दर्शन की अनुमति माँगी थी। उन्हें 2-3 वर्ष तक माता से मिलने की अनुमति नहीं मिली थी। इसके बाद जब उसे अनुमति मिली तो ना सिर्फ माता के दर्शन किए बल्कि, माता को चाँदी का छत्र भी भेंट किया। 

माता तनोट की पूजा

मंदिर में प्रवेश के साथ ही माता के मनमोहक रूप के रूप दर्शन होते हैं, जो करुणामयी हैं, चमत्कारी हैं, दुख हरने वाली हैं। सेना के नए जवान ड्यूटी ज्वॉइन करने से पहले माता के दर्शन अवश्य करते हैं। साथ ही माता की शाम और सुबह की आरती भी सेना के जवानों द्वारा ही की जाती है। 

माता तनोट की दिन में दो बार आरती की जाती है। आरती का समय सुबह 6:00 बजे और शाम 7:00 है, जिसमें सवा घंटे चलने वाली आरती श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र है। 

मंशापूर्ण माता

तनोट माता मंदिर परिसर में मंशापूर्ण माता का मंदिर भी है। मंशापूर्ण माता मतलब माँ जो अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। मंदिर में रुमाल बाँधने की पंरपरा है। प्रथा के अनुसार, श्रद्धालु मंदिर में अपनी मनोकामना माँगने के बाद रुमाल पर अपना नाम लिखकर वहीं बाँध देते हैं और जब मनोकामना पूरी हो जाती है तो अपना रुमाल पहचानकर उसे खोलते हैं और श्रद्धा अनुसार माता को भेंट चढ़ाते हैं। 

नवरात्रि के दिनों में मातेश्वरी तनोट देवी मंदिर में नौ दिनों तक मेले का आयोजन किया जाता है। इसमें माता के दर्शन करने और मेले का आनंद लेने के लिए लोग दूर-दूर से तनोट गाँव पहुँचते हैं। 

हालाँकि, पाकिस्तान के साथ सीमा कुछ ही दूरी पर स्थित होने से भक्तगण मंदिर परिसर से आगे नहीं बढ़ सकते हैं। नवरात्रि के दौरान पुजारी द्वारा विशेष हवन किया जाता है। साथ ही, इस दौरान जैसलमेर का गरबा उत्सव भी श्रद्धालुओं में लोकप्रिय है।

मातेश्वरी तनोट राय का मंदिर जैसलमेर बॉर्डर के पास ही बना है और लोंगेवाल युद्ध क्षेत्र से कुछ ही दूरी पर स्थित है। युद्धों में माता के चमत्कार के बाद माता को बमों वाली माता के नाम से भी जाना जाता है। 1200 वर्ष पुराना मंदिर भक्तों के लिए श्रद्धा का केंद्र है।

Pratibha Sharma
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