फ़रवरी 2, 2023 1:10 पूर्वाह्न

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का वर्षा जब कृषि सुखाने, समय चूकि पुनि क्या पछताने

पहले तो जबरदस्ती पकड़कर, लठैत लगाकर “विकास” कर दिया गया और अब कहा जा रहा है कि गलती हो गई, “आ अब लौट चलें”!

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कान इस तरफ से पकड़ें, या हाथ घुमा कर दूसरी तरफ से पकड़ लें, क्या फर्क पड़ता है? कान भी वही रहेगा, हाथ भी वही रहेगा और पकड़ने की क्रिया भी नहीं बदलती। एक प्रसिद्ध पत्रकार ने जब ये जवाब दिया तो कई लोग असहज हो गए। सवाल यह- था कि सरकारी काम के साथ-साथ आजकल कई एनजीओ, गैर-सरकारी संगठन भी तो जलवायु परिवर्तन, कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा इत्यादी क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। इन एनजीओ के काम करने से क्या कोई परिवर्तन आया है? इसके जवाब में कान इधर से पकड़ने और उधर से पकड़ने के जवाब की तो कोई प्रतिभागियों को उम्मीद नहीं थी। गोष्ठी का विषय पर्यावरण और जलवायु के विषय में मनुष्य का ज्ञान-अज्ञान था, जिसमें ये चर्चा चल रही थी।

बात आगे बढ़ी तो उन्होंने ध्यान दिलाया कि जो शब्दावली आज प्रयोग में आती है, वो चाहे सरकारी रिपोर्ट में हो या फिर किसी एनजीओ के शोध में, एक सी ही दिखती है। इसके इतिहास के बारे में सोपान जोशी ने बताया कि ये वर्ल्ड बैंक की शब्दावली है, इसलिए दोनों जगह एक सी है। जिस भाषा, जिस शब्दावली के जरिये हम किसी चीज को समझने का प्रयास करती हैं, अगर वो एक सी है, तो समझ भी एक सी ही होगी। ज्ञान एक सा होगा और अज्ञान भी एक सा होगा। मनुष्य के जो सबसे पुराने जीवाश्म मिलते हैं, वो करीब तीन लाख वर्ष पुराने हैं। इसकी तुलना अगर हिमालय से करें तो हिमालय आज जिस उंचाई पर है, वहाँ तो वो एक करोड़ वर्ष पहले ही पहुँच चुका था। मनुष्य और हिमालय की तुलना वैसी ही है जैसे सौ वर्ष के हिमालय के बारे में जानने के लिए किसी तीन वर्ष के मनुष्य के पास जाया जाये।

जानकारी कितनी है, कैसी है, स्थापित तथ्यों के नाम पर मीडिया, एनजीओ और सरकार सभी कैसे एक भाषा बोलने लगते हैं, इसका उदाहरण देखना हो तो इस वर्ष (2022) भारत में दुर्गा पूजा के समय तक हो रही बारिश को देख लीजिये। स्थापित विमर्श में इसे बेमौसम बरसात बताया जायेगा। “ओह रे किसान” से लेकर “अन्नदाता” तक का जाप करने वाले आपको बताएँगे कि कैसे इससे कृषि को हानी हो रही होगी। वो जो नहीं बताएँगे, वो ये है कि ये समस्या उन्होंने ही पिछले दो दशकों में खड़ी की है। परम्परागत रूप से जो धान की फसल बोई जाती थी, उसकी प्रमुख किस्में जैसे बरोबर, देसरिया, बकोल इत्यादि के लिए इस मौसम में होने वाली बारिश जरूरी होती थी। समय बदला और हाइब्रिड जल्दी पक जाने वाली धान की फसलें लगने लगीं। इसका उद्देश्य ये था कि रबी-खरीफ की दो ही फसलों के बदले किसान अपनी जमीन में ज्यादा बार फसल बो सकेगा। नतीजा? जाने देते हैं।

‘आर्द्रा’ और ‘हथिया’ नक्षत्र को बारिश के लिए ही जाना जाता था। हथिया में पानी न बरसने का मतलब सूखा पड़ना होता था। ग्रामीण क्षेत्रों में इसके लिए प्रचलित कहावत थी “आदि ना बरसे आदरा अंत ना बरसे हस्त, आ मध्य ना बरसे माघा त का करीहें गृहस्त।“ बरोबर या देसरिया जैसे धान लम्बे होते थे और पानी जमने पर भी इनकी उंचाई की वजह से ये डूबते नहीं। जो थोड़ी ऊँची भूमि थी, वहाँ परवल, सीता और चननचूर जैसी धान की नस्लें बोई जाती थीं। इनमें से परवल अब भी मिल जाता है और जैसे-तैसे बिहार के कुछ क्षेत्रों में चननचूर उपलब्ध हो सकता है। इनमें से अधिकांश नस्लें जिनके बीज के लिए किसान को बाजार पर आश्रित नहीं होना पड़ता था, अब लुप्तप्राय हैं।

स्थानीय फसलों के बीज बचा लेने की जो मुहिम चली, वो भी कोई सरकारी स्तर पर नहीं बल्कि व्यक्तिगत प्रयास ही थी। आज भारत में देशज बीज बैंक बनाने के लिए चंडीपुर (ओड़िशा) के डॉ. अशोक पाणिग्रही और कुसुम मिश्रा को जाना जाता है। केवल चावल की ही बात करें तो धान के देशज बीजों की 700 से अधिक प्रजातियों को इन लोगों ने संरक्षित कर रखा है। इसके अलावा वो सब्जियों आदि के प्राकृतिक बीजों का भी संरक्षण करने का अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं। 111 बीजों का बैंक स्थापित करने के लिए डॉ. विनोद भट्ट की भी ख्याति है।

करीब तीन दशक के प्रयासों से उन्होने भारत के 17 राज्यों में ये बीज बैंक स्थापित किए हैं, जिनमें से अधिकांश अब स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं। नवधान्य का ट्रेनिंग सेण्टर जिस भूखंड पर स्थापित किया गया है, वह युक्लिप्टस की खेती की वजह से बंजर हो गया था। सरकारी प्रयासों की बात की थी, तो याद दिला दें कि नेहरू वाले समाजवाद के मॉडल में देश भर में कई जगह युक्लिप्टस के पेड़ लगाये गए थे।

जैविक रूप से परिवर्तित किए गए बीजों की समस्या ये है कि पहले तो किसान को बीज खरीदने होंगे। फिर उर्वरक और कीटनाशक लेने होंगे। इस सारी प्रक्रिया में कई नई बातें सीखनी पड़ती हैं। कृषि में लागत मूल्य बीज, उर्वरक और कीटनाशक खरीदने के कारण बढ़ता है। किसान के कर्ज में डूबने और अंततः अपने ही खेत के लिए लाया गया कीटनाशक पीकर आत्महत्या की संभावना बढ़ जाती है।

तुलनात्मक रूप से प्राकृतिक खेती में ऐसी बातें नहीं होतीं। इसके अलावा खेतों में अनियंत्रित मात्रा में रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक डालने से कैंसर का खतरा बढ़ता है। पंजाब में आज कैंसर एक्सप्रेस एक ट्रेन का ही नाम पड़ा हुआ है। पर्यावरण पर भी इन उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रतिकूल प्रभाव होता है। तथाकथित हरित क्रांति के शुरुआती दौर में ये इसलिए नहीं दिखा क्योंकि जलवायु परिवर्तन बहुत धीमी प्रक्रिया है। कुछ दशकों बाद अब उसके नतीजे तो दिखते ही हैं।

इसके साथ ही अब “परंपरागत ज्ञान” के संरक्षण-संवर्धन की बात शुरू हो गयी है। ये हमें घुमाकर वापस वहीं ले आता है, जहाँ से हमने इस लेख में अपनी बात शुरू की थी। पहले तो जबरदस्ती पकड़कर, लठैत लगाकर “विकास” कर दिया गया और अब कहा जा रहा है कि गलती हो गई, “आ अब लौट चलें”!

पिछली बार “विकास” की बात जैसे सरकारी विभाग और एनजीओ एक सी भाषा में कर रहे थे, इस बार “परंपरागत ज्ञान” की बातें भी दोनों उसी भाषा में करते दिखेंगे। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि भारत के किसान की हालत वही है, जिसके लिए फ़िल्मी डायलॉग वाली भाषा में कहना पड़ता है, “हमें हमारे हाल पर छोड़ दीजिये माई-बाप”।

Anand Kumar
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