फ़रवरी 1, 2023 11:53 अपराह्न

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उत्तराखंड: कई संघर्षों की परिणति पहाड़ी राज्य

1 अगस्त, 2000 को लोकसभा से और 10 अगस्त, 2000 को राज्यसभा से उत्तरांचल बिल पास हो गया और आखिरकार,  9 नवम्बर, 2000 को उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश से अलग होकर 27वें राज्य के तौर एक अलग प्रदेश के रूप में अस्तित्व में आ गया।

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उत्तराखंड स्थापना दिवस

देवभूमि उत्तराखंड! गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ, देव प्रयाग और ऐसे ही न जाने कितने तीर्थ स्थलों वाला राज्य। ऐसा राज्य जिसकी सांस्कृतिक सुंदरता चर्चा का विषय ही नहीं बल्कि स्थापित सत्य है।

वर्षों तक एक अलग राज्य की माँग और उसकी आवश्यकता को आगे रखकर आंदोलन छिड़े। माँग का विरोध हुआ। कई आंदोलनकारियों को अपनी जान भी गवानी पड़ी तब जाकर पहाड़ की एक बहुत बड़ी जनसंख्या को अपना राज्य मिला।

वैसे तो एक पृथक राज्य की माँग और उससे सम्बन्धित फैसले राजनीतिक होते हैं। लेकिन, एक अलग राज्य के रूप में उत्तराखंड की माँग केवल राजनीतिक नहीं थी। देखा जाए तो इस माँग और सम्बन्धित संघर्ष के चरित्र का एक बड़ा हिस्सा सांस्कृतिक था, जो आवश्यक भी था और जन भावना के अनुरूप भी।

आज उत्तराखंड उसी संघर्ष को याद करते हुए अपना 22वाँ स्थापना दिवस मना रहा है। एक राज्य के रूप में उत्तराखंड की जो यात्रा 9 नवम्बर, 2000 को शुरू हुई, अभी तक कई मायनों में संतोषप्रद रही है। प्रदेश की राजनीतिक सोच और विरासत के लिए भी और स्थानीय जनमानस के लिए भी।

उत्तराखंड पहले उत्तर प्रदेश का हिस्सा हुआ करता था। भिन्न संस्कृति, भाषा, रीति-रिवाज, स्थानीय आकांक्षाओं और वैचारिक भिन्नता को जिस राजनीतिक समर्थन की आवश्यकता थी, उसकी भरपाई उत्तर प्रदेश से न तो हो पा रही थी और न ही उसकी सम्भावनाएँ दिखाई दे रही थीं।

बढ़ती बेरोजगारी, ग़रीबी और स्थानीय संपदाओं का दोहन जैसी समस्याओं का समाधान लखनऊ से मिलना न केवल संभव नहीं हो पा रहा था बल्कि एक समय असंभव सा लगने लगा था।

तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार का ध्यान, ऊर्जा और प्रशासनिक मशीनरी का ध्यान, शहरों के विकास कार्य तक ही सीमित रहता। सरकार द्वारा जो भी विकास योजना लागू की जाती, वो शहरों तक ही सीमित रह जाती।

इस वजह से उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र पिछड़ते जा रहे थे। यही वजह थी कि उत्तराखंड के लोगों ने अलग राज्य की माँग की। ताकि, राज्य के पहाड़ी जिलों में भी विकास के कार्य पर ध्यान दिया जाए।

वैसे तो उत्तराखंड राज्य की माँग ब्रिटिश काल के समय से ही शुरू हो गई थी। जब पहाड़ी क्षेत्र के लोगों ने अपने अधिकार और पहाड़ों की सुरक्षा के लिए आवाज उठाई। इस माँग ने 1947 में देश की स्वतंत्रता के पश्चात ज़ोर पकड़ा।

सन 1952 में आज़ादी के बाद पीसी जोशी ने पृथक उत्तराखंड राज्य की माँग की। 1955 आते-आते इस माँग की नींव मज़बूत होती नज़र आ रही थी।

इसी कड़ी में 24 जुलाई, 1979 को मसूरी में उत्तराखंड क्रान्ति दल का गठन हुआ। इस पार्टी ने उत्तराखंड राज्य के लिए जमकर संघर्ष किया और अलग राज्य की लड़ाई लड़ने में सबसे आगे रही।

पार्टी ने जून 1987 में कर्णप्रयाग में संघर्ष का आह्वान किया। पार्टी ने भारत सरकार और उत्तर प्रदेश के खिलाफ जमकर प्रदर्शन दिखाया परिणामस्वरूप अलग-अलग जिलों में हिंसक घटनाएँ देखी गई। ये घटनाएँ ऐसी रही जिसमें कई लोगों की जान भी चली गई।

1 सितम्बर, 1994 का खटीमा कांड, जब राज्य की माँग करते हुए लोगों पर पुलिस ने लाठीचार्ज और फायरिंग कर दी थी। पुलिस की इस कार्रवाई में सात लोगों की मौत हुई तो कई लोग गम्भीर रूप से घायल भी हुए।

इस घटना की प्रतिक्रिया के रूप में, मसूरी में लोगों ने 2 सितम्बर, 1994 को शांतिपूर्ण तरीके से जुलूस निकाला। यहाँ एक बार फिर पुलिस द्वारा लाठीचार्ज और फायरिंग की गई, परिणामस्वरूप कई लोगों की मृत्यु हो गई।

इन घटनाओं के चलते लोगों में सरकार के प्रति आक्रोश उमड़ पड़ा। राज्य में शिक्षकों द्वारा स्कूल बन्द कराए गए। कर्मचारियों द्वारा सरकारी कार्यों का बहिष्कार किया जा रहा था और राज्य के अन्दर चल रही रैली धीरे-धीरे दिल्ली की ओर निकल पड़ती है।

आगे चलकर चुनौतियाँ और कड़ी हो गई। 2 अक्टूबर, 1994 के दिन संयुक्त संघर्ष समिति द्वारा आयोजित रैली में शामिल होने जा रहे क्रांतिकारियों पर सरेआम गोलियाँ चलाई गईं। कई महिलाओं का बलात्कार भी हुआ। यह घटना रामपुर तिराहे में हुई और उसे राज्य आंदोलन के इतिहास में काला दिन माना जाता है।

पहाड़ी जनमानस के भीतर अपने राज्य के प्रति संघर्ष और लगातार होते बलिदान को देखते हुए प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा ने लाल किले से नए राज्य उत्तराखंड की घोषणा की। इसके पश्चात अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली तत्कालीन केंद्र सरकार ने उत्तरांचल बिल को उत्तर प्रदेश सरकार को भेजा।

उत्तर प्रदेश सरकार ने यह बिल केंद्र सरकार के पास भेजा। इसके बाद 1 अगस्त, 2000 को लोकसभा से और 10 अगस्त, 2000 को राज्यसभा से भी उत्तरांचल बिल पास हो गया। आखिरकार,  9 नवम्बर, 2000 को उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश से अलग होकर 27वें राज्य के तौर एक अलग प्रदेश के रूप में अस्तित्व में आ गया।

उत्तराखंड को पहले उत्तरांचल के नाम से जाना जाता था। इसे वर्ष 2007 में उत्तराखंड के नाम में बदल दिया गया। उत्तराखंड यानी ‘उत्तरी क्षेत्र’ राज्य का नाम बदलने का उद्देश्य उन लोगों को श्रद्धाँजलि देना था, जिन्होंने इस राज्य के लिए, उत्तरांचल आंदोलन के नाम पर लड़ाई लड़ी।

आज जब उत्तराखंड हर दृष्टि से आगे बढ़ रहा है, इस राज्य के लिए आंदोलन करने वालों की पीड़ा और उनके बलिदान को याद किया जाना आवश्यक है।

हिमांशी बिष्ट
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