फ़रवरी 4, 2023 10:34 पूर्वाह्न

Category

कौन थे श्यामजी कृष्ण वर्मा, नई पीढ़ी को जरूर जानना चाहिए

इंडियन होमरूल सोसायटी के संस्थापक पंडित श्यामजी कृष्ण वर्मा का आज ही के दिन 3 अक्टूबर, 1857 को गुजरात के माण्डवी में हुआ था।

1404
2min Read
श्यामजी कृष्ण वर्माः इनकी संस्था से ही निकले थे कई क्रांतिकारी

स्वतंत्रता सेनानी, प्रखर प्रवक्ता, पत्रकार, वकील, इंडियन होमरूल सोसायटी, इंडिया हाउस के संस्थापक पंडित श्यामजी कृष्ण वर्मा का जन्म आज ही के दिन यानी 3 अक्टूबर, 1857 को गुजरात के माण्डवी में हुआ था। 

श्यामजी कृष्ण वर्मा वो पहले भारतीय थे जिन्होंने विदेश में निवास कर रहे भारतीय युवाओं के दिल में देश के लिए प्रेम और समर्पण की भावना का प्रसार किया था। उनका कहना था, “आक्रमकता का प्रतिरोध केवल न्यायोचित नहीं, बल्कि अनिवार्य है”

श्यामजी की शिक्षाओं और विचारों से कई भारतीय स्वतंत्रता सेनानी प्रभावित हुए थे। लंदन में उनके द्वारा 1905 में स्थापित इंडिया हाउस से कई क्रांतिकारी सामने आए। इनमें भीकाजी कामा, वीर सावरकर, लाला हरदयाल, मदन लाल ढींगरा शामिल थे।

श्यामजी कृष्ण वर्मा ने अपने मासिक पत्र “द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट” के जरिए युवाओं में आजादी के विचार को भरा था, भारत को विश्व गुरु बनाने के सपनों को प्रसारित किया था।

द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट

यह मासिक पत्रिका श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा 1905 में शुरू की गई थी। इसका उपशीर्षक था, “एन ऑर्गन ऑफ फ्रीडम एंड पॉलिटिकल, सोशल एंड रिलिजियस रिफॉर्म”। 

पत्रिका के जरिए श्यामजी ने अपनी छात्रवृति योजना का प्रचार प्रसार किया और ब्रिटिश औपनिवेशक और भारतीय राजनीति पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए पत्रिका का उपयोग किया। हालाँकि, आजादी की अलख जगाना अंग्रेजी मीडिया को नागवार गुजरा और उन्होंने श्यामजी के खिलाफ कई लेख प्रकाशित किए। 

इसी वजह से 1907 में श्यामजी कृष्ण वर्मा ने संस्था का मुख्यालय पेरिस में स्थानांतरित किया था। यहीं से उन्होंने यूरोपियन देशों से समर्थन जुटाना प्रारंभ किया था। हालाँकि, बाद मे यहाँ से भी उन्होंने मुख्यालय को स्विट्जरलैंज के जिनेवा में स्थानांतरित कर लिया  था। 

वीर सावरकर एवं श्यामजी

श्यामजी कृष्ण वर्मा ने ही वीर सावरकर को इंग्लैंड भेजने और आगे की पढ़ाई करने में मदद की थी। वीर सावरकर ने इंग्लैंड में ग्रेज इन लॉ कॉलेज में दाखिला लिया था और  इंडिया हाउस में शरण ली थी। 

यहीं से प्रेरित होकर सावरकर ने अपने साथियों को भारत की स्वतंत्रता में योगदान देने के लिए प्रेरित किया। साथ ही, उन्होंने भी फ्री इंडिया सोसायटी की स्थापना भी की। 

दयानंद सरस्वती और आर्य समाज

श्यामजी कृष्ण वर्मा दयानंद सरस्वती से प्रभावित थे और आर्य समाज की शिक्षा ने उनमें राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ावा दिया था। वह बंबई आर्य समाज के अध्यक्ष भी बने और सांस्कृति राष्ट्रवाद के पक्षधर रहे। इसी विचारधारा से भारत में उन्होंने ब्रिटिश शासन द्वारा लाए जा रहे भारत की संस्कृति को प्रभावित करने वाले बिलों का विरोध भी किया।

1890 में उन्होंने लोकमान्य तिलक के साथ ‘आयु विधेयक की सहमति’  का विरोध किया था। 1897 में उन्होंने चापेकर भाइयों का समर्थन किया, जिन्होंने पुणे में ब्रिटिश प्लेग कमिश्नर डब्ल्यू सी. रैंड की हत्या की थी।

ब्रिटिश प्लेग कमिश्नर ने शहर में प्लेग फैलने के दौरान निर्मम नीतियों को लागू किया था। श्यामजी कृष्ण वर्मा इन घटनाओं द्वारा लंदन में रहते हुए अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित हुए थे। इन्होंने ही ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे सभी छात्रों को दयानंद सरस्वती की  स्मृति में 2000 रुपए की स्कॉलरशिप देने की घोषणा भी की थी। 

इंग्लैंड के अंदर भारतीयों को नस्लवाद का सामना करना पड़ता था। इसके लिए उन्होंने भारतीय छात्रों के लिए इंडियन हाउस की स्थापना की थी। इंग्लैंड में ही उन्होंने इंडियन होमरूल सोसायटी की स्थापना की थी, जिसके पीछे उद्देश्य था, “भारत के लिए होमरूल सुरक्षित करना। उसी को प्राप्त करने की दृष्टि से सभी व्यावहारिक साधनों द्वारा इंग्लैंड में प्रचार करना। भारत के लोगों के बीच स्वतंत्रता और राष्ट्रीय एकता के उद्देश्यों को फैलाना”

1905 में श्यामजी कृष्ण वर्मा को औपनिविशिक सरकार के खिलाफ लेख लिखने का दंड भुगतना पड़ा। उन पर देशद्रोह के आरोप लगाए गए और इनर टेंपल द्वारा उनकी वकालत पर रोक लगा दी थी। ऑनरेबल सॉसाइटी ऑफ इनर टेंपल, लंदन बैरिस्टर और जजों के लिए चार पेशेवर संघों में से एक है। इसने आगे चलकर 1909 में श्यामजी को संस्था से भी हटा दिया था। 

हालाँकि, 2015 में इस निर्णय पर एकबार फिर विचार करने के बाद उन्हें हटाए जाने के निर्णय को सर्वसम्मति से अनुचित माना गया। गवर्निंग  काउंंसिल ने माना कि वर्मा के मामले में पूरी तरह से निष्पक्ष सुनवाई नहीं हुई थी। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद श्यामजी कृष्ण वर्मा ने स्विट्जरलैंड के जिनेवा में अपना  शेष जीवन व्यक्त किया और यहीं पर 30 मार्च, 1930 को आखिरी सांस ली। 

राष्ट्र के लिए श्यामजी के समर्पण, प्रेम को आज की पीढ़ी भी जाने, उनके विचारों का पूरा प्रसार हो, इसी सोच के साथ 2003 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और अभी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिनेवा से श्यामजी कृष्ण वर्मा की अस्थियां भारत लेकर आए थे। साथ ही, कुछ वर्षों के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने ही  2010 में गुजरात के माण्डवी में श्यामजी कृष्ण वर्मा का स्मारक बनाया गया, जिसे क्रांति तीर्थ नाम दिया गया। 

प्रधानमंत्री मोदी ने इस दौरान कहा कि भारत माता के सपूत (श्यामजी कृष्ण वर्मा) का सपना था कि एक दिन भारत आजाद हो, अंग्रेजों का राज खत्म हो और भारत फिर विश्व गुरु बने। अंग्रेज चले गए, भारत आजाद हो गया लेकिन, भारत का विश्व गुरु बनना अभी बाकी है। 

श्यामजी कृष्ण वर्मा का लक्ष्य भारत की आजादी और औपनिवेशिक सोच से मुक्ति था। प्रधानमंत्री मोदी  भी औपनिवेशिकता की निशानियों से देश को मुक्त करने की बात करते हैं। वह लगातार एक भारत, श्रेष्ठ भारत की बात करते हैं। यह तब ही संभव है, जब युवा पीढ़ी अपने असली नायकों को पहचाने।

Pratibha Sharma
Pratibha Sharma
All Posts

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Recent Posts

Popular Posts

Video Posts