फ़रवरी 4, 2023 2:24 अपराह्न

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क्या भारत अपने निजी 'द ग्रेट स्टिंक' तक जाकर रहेगा?

दोनों नदियों की सफाई को लेकर शासन और प्रशासन के दावों और वादों के खोखले साबित होने के अलावा एक समानता यह भी है कि दोनों की दुर्गति में देश की राजधानियों का हाथ था।

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यमुना

छठ पूजा के आगमन के साथ यमुना में झाग और ‘द ग्रेट यमुना डिबेट’ का भी आगमन होता है। पिछले कई वर्षों में दिल्ली के सत्ता गलियारों में बैठे लोगों से लेकर आम लोगों तक को यमुना की याद छठ पूजा के साथ ही आती है। पूरे वर्ष भर जो काम दिल्ली की फैक्ट्रियों से निकलने वाले खतरनाक रसायन, औद्योगिक कचरा और प्रशासनिक बेपरवाही नहीं कर पाते, वह काम यमुना में बनने वाला झाग कर डालता है। झाग अधिक शक्तिशाली होता है या चल रहे झाग की तस्वीरें और वीडियो, यह शोध का विषय हो सकता है।

दशकों तक यमुना की दुर्गति देखने के आदी शहरी और शहर, उसमें बह रहे रासायनिक झाग देखकर विचलित हो जाते हैं, यह स्वीकार करने का मन ही नहीं होता। पर मन हमेशा सही हो, यह जरूरी नहीं है। यमुना को लेकर तीन चार दिनों की चिंता हमारी संवेदनाओं और दिल्ली के मालिक के वादों को क्यूटता प्रदान करती हैं। पता नहीं चलता कि हमारे कठोर मन को नदी में तैरने वाला रासायनिक झाग चार दिन के लिए कोमल क्यों कर देता है? या फिर दिल्ली के मालिक झाग देखकर हड़बड़ी में यमुना साफ करने का वादा क्यों कर डालते हैं?

कौन सी ग्लानि हमें ऐसा करने के लिए और उन्हें वैसा करने के लिए उकसाती है?

झाग देख यमुना के अस्तित्व को लेकर हमारे मन में प्रश्न क्यों उठने लगता है? हम इस प्रश्न से व्याकुल क्यों हो जाते हैं कि; कहीं यमुना सरस्वती की तरह ही गायब तो नहीं हो जाएगी? यदि हमारा विश्वास धर्म शास्त्रों में वर्णित कथाओं पर है तो शास्त्रों के अनुसार जिस यमुना को उसके भाई यमराज से अमरता का आशीर्वाद प्राप्त है, उसके अस्तित्व की चिंता हमें क्यों होने लगती है? हमें यमराज के वचन पर आस्था नहीं है या शास्त्रों में लिखे शब्दों पर? कारण चाहे जो हो, ये प्रश्न शायद इसलिए उठते हैं क्योंकि हमारे शास्त्र हमें तर्कसंगत रहने और प्रश्न पूछने के लिए उकसाते हैं। यही हमें बताते हैं कि प्रश्न पूछना अनिवार्य क्यों हैं। शायद इसलिए मन ऐसे प्रश्न खड़ा करता है।

पर इन प्रश्नों का उत्तर प्रश्न पूछने वाला तो दे नहीं सकता। उत्तर देने का काम तो उन्हें करना है जिनके पास समाधान है। जो उत्तर देने के लिए बुद्धि और साधन संपन्न हैं। यह बात और है कि साधन और बुद्धि संपन्न लोग उत्तर देने के नाम पर वादे से आगे जा ही नहीं पाते। वादों से आगे जाकर कुछ करने में मेहनत लगती है। वादे करने वाले दिल्ली के मालिक (या मुख्यमंत्री, जो अच्छे लगे, लगा लें) पढ़े-लिखे हैं। साइंटिफिक टेम्पर संपन्न हैं। प्रशासनिक अधिकारी रह चुके हैं। एक आम औसत नेता की तुलना में भारत की समस्याओं और उनके समाधान की उनकी समझ बेहतर है। ऊपर से भारत और उसकी राजनीति को बदलने का वचन देकर आये थे।

प्रश्न ही प्रश्न हैं

ऐसा क्यों कि इतनी गंभीर समस्या पर पिछले सात वर्षों में दिल्ली के मालिक वादे से आगे नहीं बढ़ सके? वादे से आगे जाकर कब कुछ करेंगे? यदि कुछ नहीं किया तो क्या होगा? क्या अमरता का आशीर्वाद मिलने के बाद भी यमुना अमर नहीं रह पायेगी? क्या भारत अपने निजी ‘द ग्रेट स्टिंक’ की ओर बढ़ रहा है? इक्कीसवीं सदी में यमुना की हालत क्या उन्नीसवीं सदी में नाले में बदल जाने वाली टेम्स के जैसी हो जाएगी? यमुना को साफ़ करने के वादे क्या टेम्स को साफ़ करने के वादे जैसे ही साबित होंगे?

ये प्रश्न इसलिए क्योंकि दोनों नदियों की सफाई को लेकर शासन और प्रशासन के दावों और वादों के खोखले साबित होने के अलावा एक समानता यह भी है कि दोनों की दुर्गति में देश की राजधानियों का हाथ था। थोड़ा एडजस्टमेंट किया जाए तो एक समानता और है। शासन प्रशासन की विफलता के बाद टेम्स की सफाई का काम महान वैज्ञानिक माइकल फैराडे ने किया था।

इधर दिल्ली के मालिक भी वैज्ञानिकता से दूर नहीं। सर्वोच्च तकनीकी शिक्षा प्राप्त विद्वान हैं। समय-समय पर बताते रहते हैं कि वे आई आई टी से पढ़े हैं। ऐसे में अपनी वैज्ञानिक सम्पन्नता को काम में लाकर दिल्ली को उसकी यमुना वापस करने से पीछे क्यों भागना? यही तो मौका है अपने साइंटिफिक टेम्पर की सम्पन्नता को साबित करने का। यही मौका है नेतृत्व की क्षमता को साबित करने का।

जनता का काम प्रश्नों के उत्तर की संभावना तलाशना है। प्रश्नों का उत्तर देना नेता का काम है। देखना यह है कि हर वर्ष की भाँति छठ पूजा पर छिड़ी बहस इस बार ख़त्म हो चुकी है या तब तक चलेगी जब तक प्रश्नों का उत्तर न मिल जाए या अगली छठ पूजा न आ जाए।

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